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धन्य तोँ हे पाञ्चाली

dhanya ton he panchali

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

धन्य तोँ हे पाञ्चाली

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

और अधिककाञ्चीनाथ झा 'किरण'

    पाँच जनकसँ जनमल

    पाँच रंगकेर

    शोणित सहज स्वभाव शरीर

    समन्वित पाँच भाय छल

    पाण्डुक पुत्र

    पाण्डव नामे ख्यात

    जेठ युधिष्ठिर

    गोरहाक जेठ सन

    शुद्ध भींतर-बाहर एक भाव

    जूआक चसकमे पागल

    राजपाट घर द्वार

    सकल सम्पत्ति

    सरि गेलहुँ—जे चेति सकला

    माय संग स्त्री तक के

    देलन्हि दावपर राखि

    भीम रहथि बलवान मस्त

    उद्दण्ड, भोजन प्रेमी, असहिष्णु

    अर्जुन धीर, वीर, गम्भीर

    विद्वान, विवेकी

    नारी सौन्दर्यक उपमान उर्वसी

    डोला सकलि नहि जनिकर मनकेँ

    सुन्दरता-यौवन

    तारूण्य तरङ्गित काम सिन्धु सम

    नृपति विराटक अन्तः पुरमे

    एक वर्ष भरि बास कयल

    मुदा ककरहु नहि आभास भेटल

    पुरुषत्वक—

    संयमसँ सैंतल चित्तक सीमा पार

    कहि सकैत छी एकरा

    नकुल सुन्दर सुकुमार सौखीन

    सहदेव, धुइयाँ, मितभाषी विद्वान

    एहि पाँच स्वभावक पुरुषक पत्नीत्व

    लेलहुँ अहाँ सकारि

    अहाँ पांचाल नरेशक कन्या सुन्दरि सुकुमारि

    से कियैंक

    हमर जनैत विधवा वृद्धा कुन्तीक

    विवश व्याकुल व्यग्र नयनकेँ देखि

    स्नेहिल हृदय अहाँक

    छल भय गेल द्रवित

    ते समाजक उपहास

    शारीरिक श्रम

    व्यवहार विकटता

    शृंगार-हास्य-रसकेर जटिलता

    केर ने कयल विचार

    केहन कठिनताकेर अनुभूति

    कयल अहाँ जीबन भरि

    लक्ष्य वेध कय अर्जुन जखन अहाँक

    कर किसलय घयल

    कौरव कुलक विभूति

    वीर शिरोमणि, अव्यर्थ लक्ष्य

    सुन्दर अर्जुनकेर घरनी

    होयबामे उठल होयत हिलकोड़

    केहन अहाँकेर मन सागरमे

    मुदा भेल की

    पाँच स्वभाव देह, सामर्थ्यक

    पति मनक परितोष

    अभिनय निपुणा, अभिनेत्रीक

    प्रतिखन परिवर्तन करय पड़ैत

    छल होयत

    ततबे नहि

    भरल सभामे भेलहुँ बेनगन

    पिट्ठा पहलवान स्वामी सभ

    बैसल देखैत रहय तमासा

    राजमहलकेर बदलामे

    करय पड़ल बनबास

    टुटपुजिया राजा विराटकेर रानी

    केर बनलहुँ वानी

    तदपि अहाँकेर मनमे

    जनमल नहि परिताप

    कुन्तीक विषयमे भावक

    नहि भेल कनेको परिवर्तन

    प्रख्यात सुन्दरी कुन्ती

    पौलक पति पाण्डु निपुंसक रोगी

    की करैत

    जननी माता कोना कहाबैत

    अतः विवस भय

    दोसर बाटसँ

    पुत्रवती छलि भेलि

    एक विवश नारीक हेतुऽएँ

    अहाँ अपन जीवनकेँ कयल

    झंझटसँ आकीर्ण

    पाँचो पाण्डवकेँ जीवन भरि राखि

    एकताबद्ध

    भातृप्रेमकेर दर्शाओल अहीँ नजीर

    तेँ हे पाञ्चाली छी करैत हम

    अभिनन्दन

    स्रोत :
    • पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 59)
    • संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
    • रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
    • प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
    • संस्करण : 1989

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