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देर रात सूनी सड़क पर जाती तीन औरतें

der raat suni saDak par jati teen aurten

सारिका श्रीवास्तव

सारिका श्रीवास्तव

देर रात सूनी सड़क पर जाती तीन औरतें

सारिका श्रीवास्तव

और अधिकसारिका श्रीवास्तव

    रात के पौने दो बजे

    सुनसान सड़क

    और तीन औरतें।

    किसी शादी से

    खाना बनाकर लौट रही लगती थीं।

    उनके नायलॉन के थैलों में

    शायद भरा होगा

    ठेकेदार की चुभती नज़रों से

    छुपाकर रखा

    शादी में बनाया खाना

    अपने बच्चों के लिए।

    धीमे-धीमे बतियातीं

    सतर्क निगाहों से

    रात के उजले अँधेरे से

    सामना करती

    चली जा रही हैं वे तीन औरतें

    अकेली नहीं हैं वे

    अकेली नहीं हैं वे

    उनके साथ

    थके और सुस्त शरीर को लादे

    घिसट रहा है

    उन्हें अकेले होने से बचाता हुआ

    अपने पास लिंग होने का नाद करता

    एक असहाय पुरुष।

    जो ख़ुद शिकार है

    अपने ही हमज़ात लिंगधारियों का।

    चिंता लग रही है मुझे

    जाने घर सलामत पहुँची

    भी होंगी कि नहीं?

    उम्मीद कम ही है

    कि औरतखोरों से बच भी पाई होंगी।

    देर रात सड़क पर जाती

    वे तीन औरतें

    केवल औरत होती हैं

    मरियम, सीता या सैयदा

    नहीं होतीं।

    देर रात सूनी सड़क

    पर जाती वे तीन औरतें

    कुछ नहीं सोचतीं।

    वे फ़ासीवाद जानती हैं

    पूंजीवाद

    नवउदारवाद से उन्हें

    दूर-दूर तक

    कुछ लेना-देना नहीं है।

    वे सिर्फ़ इतना चाहती हैं

    की जल्द बन जाए

    उनका राशन कार्ड

    और बूढ़ी विधवा सास को

    मिलने लगे

    पेंशन के तीन सौ रुपए।

    शादीवाले घर से

    किस तरह छुपाकर लाया जा सके

    अपने भूखे बच्चों

    को खाना।

    उन्हें किसी तरह के आँकड़ों में

    कोई रुचि नहीं है।

    प्याज या दाल के बढ़ते दाम

    उनके खाने पर

    बस इतना फ़र्क़ डालते हैं

    की ग़ायब हो जाती है

    दाल की कटोरी

    उनकी ही थाली से

    लेकिन

    फिर भी वे विचलित नहीं होतीं।

    वे अकाउंट जानती हैं

    लेकिन अकाउंट की राजनीति

    नहीं जानतीं।

    बजट बनाना भी उन्हें

    बहुत अच्छे से आता है

    बजट में राजनीति का घालमेल

    वे नहीं जानतीं।

    वे अच्छे से जानती हैं समाज के

    ताने-बाने को

    लेकिन उसके राजनीतिक चेहरे

    का पाठ नहीं पढ़ने दिया गया उन्हें।

    जिस दिन जान जाएँगी वे

    अर्थशास्त्र के आँकड़े,

    समाज के ताने-बाने को

    बुनने वाले सूत की बुनावट

    और

    राजनीति की उलटबांसियाँ।

    मुझे नहीं लिखना पड़ेगी ऐसी कविता—

    स्रोत :
    • रचनाकार : सारिका श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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