वेणु-वनमे आइ हेरब हम ने मुरली रास।
आबि गेल अछि आइ हमरे द्वारिपर आकाश।
मोन होइछ तोड़ि दी हम आइ सीमा-बन्ध।
पंखड़ीकेँ फोड़ि उमड़ल कमल-फूलक गन्ध।
गन्धमे भासल चलल जाइछ हमर निर्वाण।
जानि ने, ई कोन गिरिसँ भेल अछि आह्वान।
भेल जाइछ शिथिल सब बन्धन अनागत केर।
टूटि गेल अछि हमर मोनक नियत एके बेर।
आइ सोझामे खुजल अछि एक नव आयाम।
प्राण स्पन्दन-हीन, बोधक चेतना निष्काम।
ई समर्पित क्षण, हमर युग-व्यापिनी संक्रान्ति। .
मौनमे स्वीकृत असंगति, उल्लसित दिग्भ्रान्ति।
शरत-सुषमामे तरंगित मदनिका साभार।
गन्ध-मूर्छित डारिसँ झड़-झड़ित हरसिंगार।
नीनसँ हमरा जगा कऽ के चतुर चितचोर।
स्वप्न-अन्तर्धान होइछ देखतहि शुचि भोर।
सहज जीवन प्रति असहमतिमे उठल जे हाथ,
दऽ रहल छै आइ कोनो प्रिय ओकर ने साथ।
पथिक एकाकी, पथक ने ओर कोनो छोर।
सून मन्दिरमे घिरल भावक घटा घनघोर।
- पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 86)
- रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
- प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
- संस्करण : 2011
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