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चुप्पी, माफ़ी और परिवार

chuppi, mafi aur parivar

सुमन शेखर

सुमन शेखर

चुप्पी, माफ़ी और परिवार

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    एक

    मैंने चाहा था बस इतना

    कि कह सकूँ तुमसे वह सब

    जिसका बीज बचपन से

    सपनों में नमी की तलाश करता रहा

    तुम मिले, तो सुकून से जड़ों ने फैलना शुरू किया

    इंतज़ार इंतज़ार इंतज़ार…एक लम्बा इंतज़ार

    और वह बीज जाने कब का सूख चुका है

    मेरे भीतर ‘अनकहे’ बातों का अवशेष है

    मेरा मन स्मारक है उन तमाम यातनाओ का

    जो मैं तुमसे कभी कह सका

    स्मारक संजोते हुए ख़ुद ही दब जाऊँगा किसी रोज़ कब्र में

    कहना मत तब भी...

    तुम्हारी चुप्पी के लिए है किसी सज़ा का प्रावधान!

    दो

    इतने लंबे इंतज़ार के बाद…

    इससे पहले कि तुम मुझे माफ़ करने की सोचो

    मैं जीवन भर की ग्लानि में तुम्हें छोड़ जाऊँगी

    तुमसे ही तो सीखा है सब

    भूल जाने के झूठ तले अनवरत ग्लानि का रस देना

    फ़र्क़ इतना रहेगा

    कि तुम मुझे देख लेते थे उसमें गलते, जीते हुए

    और हो लेते थे संतुष्ट मुझे तड़पता देखकर

    मैं तुम्हें वह हक़ भी नही दूँगी

    नहीं देखूँगी कभी

    तुम हमेशा पाओगे मुझे एक जगह पर स्थिर पत्थर की तरह।

    तीन

    शहर से दूर जाकर एक घर की ख़्वाहिश थी

    उस घर के बाहर टँगा होता 'अपना सुखी परिवार'

    हम तुम तपती दुपहरी में पेड़ से तोड़ लेते अंजीर

    और टुकड़ा-टुकड़ा चख़ कर बाँटते प्यार

    जहाँ घर बनाने की उम्मीद थी

    वहाँ आत्मा नहीं बसी

    देह बस हो गई।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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