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चुंबन

chumban

गीता मलिक

गीता मलिक

चुंबन

गीता मलिक

और अधिकगीता मलिक

    हमारे ज़हन में चुंबनों की खान ढहती हैं

    समय बेसमय बरसते हैं

    कलेजे पर पत्थर की तरह

    तो कभी

    हथोड़े की तरह

    कभी मलाल तो कभी टीस की तरह

    चुंबनों ने गाढ़ दिए हैं स्तंभ

    बिना शिनाख्त वाली जगहों पर

    बिना पते वाले रास्तों से जाते हैं

    अपनी मर्ज़ी से तय शुदा समय पर

    वे नहीं जानते निर्जन भीड़ और कोलाहल

    वे नहीं जानते धूप छाँव

    भाव-अभाव

    चुंबन गिर पड़ते हैं अथाह ऊँचाइयों से

    उस दौर में जब कोई नहीं होता आस-पास

    चुंबन संभाल लेते है आत्म हत्या जैसे दुर्विचार में

    चुंबन पकड़ते है सबसे नाजुक नस

    और ले जाते है धरती के और समीप

    उछाल देते है कभी आसमान में

    चुंबन कराते हैं अपने देह से प्यार

    इंद्रधनुष में समाहित हैं चुंबनों का रंग

    सामिप्य में अतरंगी है

    उल्लास में मधुमास

    और दुर्दिन की एक कविता में

    बन जाते हैं आलंबन

    बचा लेते है भीड़ में खोने से!

    स्रोत :
    • रचनाकार : गीता मलिक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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