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रफ़ू करती औरत

rafu karti aurat

सड़क किनारे बैठी है कपड़े रफ़ू करती औरत।

लोगों की आवाजाही से

धूल के गुबार उठते हैं

जमती रहती है धूल उसकी ओढ़नी पर

मटमैले करती रहती है उसके कपड़े

रोने लग पड़ती है उसकी बिटिया

पर उसके आँसुओं की तरफ़ देखने का

उसके पास वक़्त नहीं,

धूप में ही सूख कर जम जाते हैं आँसू

बिटिया के गालों पर।

चुपचाप वह सोचती रहती है अपने घर के बारे में,

घर—जो गोलाबारी में बरबाद हो गया।

चुपचाप रफ़ू करती रहती है लोगों के कपड़े

और बराती रहती है बच्ची की आँखें,

ललछौं आँखें, बेचारगी से भरी

निहारती रहती हैं छूछी टोकनी।

सड़क किनारे बैठी है कपड़े रफ़ू करती औरत

सड़क जो जाने कहाँ-कहाँ तक भागती चली गई है।

वह रफ़ू करती है किसी बटोही की जुराबें

और बटोही रफ़ू की हुई जुराबें लेकर

आगे बढ़ जाता है।

स्रोत :
  • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 249)
  • रचनाकार : आई छिंग
  • प्रकाशन : मेधा बुक्स
  • संस्करण : 2003

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