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पेशोला की प्रतिध्वनि

peshola ki pratidhvani

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद

पेशोला की प्रतिध्वनि

जयशंकर प्रसाद

और अधिकजयशंकर प्रसाद

    अरुण करुण बिंब!

    वह निर्धूम भस्म रहित ज्वलन पिंड!

    विकल विवर्तनों से

    विरल प्रवर्तनों सा—

    पश्चिम के व्योम में है आज निरवलंब सा।

    आहुतियाँ विश्व की अजस्त्र ले लुटाता रहा—

    सतत सहस्त्र कर माला से—

    तेज ओज बल जो वदान्यता कदंब-सा।

    पेशोला की उर्मियाँ है शांत, घनी छाया में—

    तट तरु है चित्रित तरल चित्रसारी में।

    झोंपड़े खड़े हैं बने शिल्प ये विषाद के—

    दग्ध अवसाद से।

    धूसर जलद खंड भट पड़े हैं,

    जैसे विजन अनंत में।

    कालिमा बिखरती है संध्या के कलंक सी,

    दुंदुभि-मृदंग-तूर्य शांत स्तब्ध, मौन है।

    फिर भी पुकार सी है गूँज रही व्योम में—

    कौन लेगा भार यह?

    कौन विचलेगा नहीं?

    दुर्बलता कर लोहे से, परख कर बज्र से,

    प्रलयोल्का खंड के निकष पर कस कर

    चूर्ण अस्थि पुंज सा हँसेगा अट्टहास कौन?

    साधना पिशाचों की बिखर चूर-चूर होके

    धूलि सी उड़ेगी किस दृप्त फूत्कार से।

    कौन लेगा भार यह?

    जीवित है कौन?

    साँस चलती है किसकी

    कहता है कौन ऊँची छाती कर, मैं हूँ—

    —मैं हूँ—भेवाड़ में,

    अरावली शृंग सा समुन्नत सिर किस का?

    बोलो, कोई बोलो—अरे क्या तुम सब मृत हो

    आह, इस खेवा की!—

    कौन थामता है पतवार ऐसे अंधड़ में

    अंधकार पारावार गहन नियति सा—

    उमड़ रहा है ज्योति-रेखा-हीन क्षुब्ध हो।

    खींच ले चला है—

    काल-धीवर अनंत में,

    साँस, सफरी सी अटकी है किसी आशा में।

    आज भी पेशोला के—

    तरल जल मंडलों में,

    वही शब्द घूमता सा—

    गूँजता विकल है।

    किंतु वह ध्वनि कहाँ?

    गौरव की काया पड़ी माया है प्रताप की

    वही मेवाड़!

    किंतु आज प्रतिध्वनि कहाँ?

    स्रोत :
    • पुस्तक : जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली (काव्य खंड-4) (पृष्ठ 379)
    • संपादक : सत्यप्रकाश मिश्र
    • रचनाकार : जयशंकर प्रसाद
    • प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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