Font by Mehr Nastaliq Web

फूले मटरा के म्याड़न पर, हम जोलिन ते ठलुहायि करति

निःचित जुवानि जगी नस-नस, जागे मन-हे-मन खिलति जाति,

वह चटकि चमारिन च्वाट करयि, कच ढिल्लन पर डिंगारु अयिसि—

सतजुग वाली।

वुयि साँची-सूधी बातयि वहि की, आपुइ रूपु बनयिं कविता—

जस उवति सुर्ज्ज-किरनन की काँबी हिरदउँ भीतर घुसि जायि,

बेजा दबावु पर तिलमिलाय का नागिनि असि फनु काढ़ि देयि;

को चितयि सकयि?

दुनिया के पाप-पुण्य की कयिंची का वुहिका का कतरिसि-ब्यउँतिसि?

'तुइ अस हँसे,' 'तुइ वसयि रहे' मुरही बातन के तीख तीर;

अपने साथी बिरवा पर मानउ लता अयिसि लपिटायि रही—

तन ते-मन ते।

'मइँ तुहि ते, तब तुई महिते हयि, जिहि के चमार का एकु कौल

दूनउ वारन के खुले क्यँवाँरन की पियार की क्वठरी मा,

अंतरजामी बनि, आँखी मूँदे, लुकी - लुकउवरि खेलि रहे,

को छुइ पावयि?

ब्यल्हरातयि आवा, हँसतयि पूछिसि, 'के री, रोटी कहाँ धरी?'

रूखी-सूखी, सिकहर ऊपर मोरे छइला, मोरे साजन।

कहि आँखिन पर बइठारि लिहिस, धनु धूरि भवा, युहु धरमु देखि,

समुझवु कोई?

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 147)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

Additional information available

Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

OKAY

About this sher

Close

rare Unpublished content

This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

OKAY