चकल्लस
chakallas
अगहनी पुन्नमासी क्यार म्याला देखि छकि आयउँ;
पयिसवा तीनि आता तूरि का परसाद घर लायऊँ।
दुयि घरी दउस के चढ़तयि रहकला, बहला अउ अद्धा;
चलयि लागीं चह्वद्दी ते, कहाँ संभारु कयि पायउँ।
चला टींड़ी तना मनई, न ताँता टूट दुयि दिन तक;
कचरि छा सात गे तिनमा, अधमरा मयिं घरयि आयउँ।
सुर्ज बइठे मुजाका का कि द्वासर दिनु भवा म्याला;
गड़ी गैसै, बरयिं बिजुली, चमाका देखि चउँध्यान्यउँ।
जहाँ द्याखउ तहाँ ददुआ, लाग ठेंठर गड़े सरकस;
ठाढ़ तंबू कनातन मा चक्यउँ, चउँक्यउँ कि बउरान्यउँ।
जो देख्यउँ याक म्वहरे मा बड़ी भीरयिं बड़े जम्मट;
महूँ टोयउँ कि अलबट्टी पयिसवा सातहे पायउँ।
उठयिं रुपयन की छर्रयि अउर गुलछर्रयि करयिं बाबू;
टिकस के चारि आना जानि मयिं जर-मूड़ ते सूख्यउँ।
चवन्नी की रहयि ज्वँधरी परी झ्वारा म पीठी पर;
मुलउ टिक्कसु उधारउ काढ़ि का काका न लयि पायउँ।
लिहिनि वढ़कायि दस बजतयि सबयि खिरकिन कि टटियन का;
ठनक तबला कि भयि भीतर टीप फिरि याक सुनि पायउँ।
जो बाढ़ी चुल्ल खीसयि काढ़ि का बाबू ति मयिं बोल्यउँ;
“घुसउँ भीतर ?” चप्वाटा कनपटा पर तानि का खायउँ।
यितनिहे पर न ख्वपड़ी का सनीचरू उतरिगा चच्चू;
सउँपि दीन्हिसि तिलंगन का चारि चबुका हुँअँउँ खायउँ।
रहयिं स्यावा समिरिती के बड़े मनई कि द्यउता उयि;
किहिनि पयिंयाँ-पलउटी तब छूटि थाने ति फिरि पायउँ।
चला आवति रहउँ हफ्फति तलयि तुम मिलि गयउ ककुआ;
रोवासा तउ रहउँ पहिले ति तुमका देखि डिंड़कार्यउँ।
तनकु स्वहितायि ल्याहउँ, तब करउँ बरनकु चकल्लस का;
पुरवुले पाप कीन्हेउँ, तउन दामयि दाम भरि पायउँ।
- पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 70)
- संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
- रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
- प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
- संस्करण : 1998
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.