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अगहनी पुन्नमासी क्यार म्याला देखि छकि आयउँ;

पयिसवा तीनि आता तूरि का परसाद घर लायऊँ।

दुयि घरी दउस के चढ़तयि रहकला, बहला अउ अद्धा;

चलयि लागीं चह्वद्दी ते, कहाँ संभारु कयि पायउँ।

चला टींड़ी तना मनई, ताँता टूट दुयि दिन तक;

कचरि छा सात गे तिनमा, अधमरा मयिं घरयि आयउँ।

सुर्ज बइठे मुजाका का कि द्वासर दिनु भवा म्याला;

गड़ी गैसै, बरयिं बिजुली, चमाका देखि चउँध्यान्यउँ।

जहाँ द्याखउ तहाँ ददुआ, लाग ठेंठर गड़े सरकस;

ठाढ़ तंबू कनातन मा चक्यउँ, चउँक्यउँ कि बउरान्यउँ।

जो देख्यउँ याक म्वहरे मा बड़ी भीरयिं बड़े जम्मट;

महूँ टोयउँ कि अलबट्टी पयिसवा सातहे पायउँ।

उठयिं रुपयन की छर्रयि अउर गुलछर्रयि करयिं बाबू;

टिकस के चारि आना जानि मयिं जर-मूड़ ते सूख्यउँ।

चवन्नी की रहयि ज्वँधरी परी झ्वारा पीठी पर;

मुलउ टिक्कसु उधारउ काढ़ि का काका लयि पायउँ।

लिहिनि वढ़कायि दस बजतयि सबयि खिरकिन कि टटियन का;

ठनक तबला कि भयि भीतर टीप फिरि याक सुनि पायउँ।

जो बाढ़ी चुल्ल खीसयि काढ़ि का बाबू ति मयिं बोल्यउँ;

“घुसउँ भीतर ?” चप्वाटा कनपटा पर तानि का खायउँ।

यितनिहे पर ख्वपड़ी का सनीचरू उतरिगा चच्चू;

सउँपि दीन्हिसि तिलंगन का चारि चबुका हुँअँउँ खायउँ।

रहयिं स्यावा समिरिती के बड़े मनई कि द्यउता उयि;

किहिनि पयिंयाँ-पलउटी तब छूटि थाने ति फिरि पायउँ।

चला आवति रहउँ हफ्फति तलयि तुम मिलि गयउ ककुआ;

रोवासा तउ रहउँ पहिले ति तुमका देखि डिंड़कार्यउँ।

तनकु स्वहितायि ल्याहउँ, तब करउँ बरनकु चकल्लस का;

पुरवुले पाप कीन्हेउँ, तउन दामयि दाम भरि पायउँ।

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 70)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

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