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चाही मिथिला राज

chahi mithila raaj

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

चाही मिथिला राज

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    बहुत झुकओलहुँ आब ने चलते घाड़ झुकओने काज

    अइसँ नीचा किछु नहि चाही, चाही मिथिला राज॥

    बहुतहु दिनसँ बहुतहु विधिसँ चुट्टी बिठुआ काटल

    अपन जिद्दकेँ अपनहुँसँ भल, उच्चासनपर राखल

    फिकिर कयल नहि ककरा हाथेँ, कत्ते नाक कटायल

    गमा देल अपनेसँ सबटा, तखन बात बुझायल।

    चेतू आबहु, चलू शेष जँ, कोनो गत्रमे लाज

    अइसँ नीचा किछु नहि चाही, चाही मिथिला राज॥

    कान अपन छल कौआ लऽ गेल, कानो अनके सूनत

    बासन चाटि रहल अछि कुकुर, सेहो आने रोमत

    आनक आस भरोसक बल निज हाथ हाथ पर धरबे

    तकितहि तँ रहि गेलहुँ आइ धरि, अहिना टुक-टुक तकबे।

    पाथर केर चश्मा जुनि पहिरू, फनिगा लाग बाज

    अइसँ नीचा किछु नहि चाही, चाही मिथिला राज॥

    पुश्त-पुश्तसँ चार सटल अछि, तैयो आन कोना

    एकहि चूल्हिक रान्हल खाइ छी, तैयो आन कोना

    नीक बेजायमे सदिखन साझी, तैयो आन कोना

    काकी, बाबी, बाबा एके, तैयो आन कोना ओ?

    दुष्ट बुद्धि बहकओलक बहुतहु, सोचू सकल समाज

    अइसँ नीचा किछु नहि चाही, चाही मिथिला राज॥

    बहुत लगाओल नारा तैयो, कत्तहु चूकि रहल छी

    जाधरि सम्हरि सङोर ने होयत, मिथ्या भूकि रहल छी

    चूक कतहु कयलहुँ अछि निश्चय, बाबू एकरा मानू

    मुदा चेति जँ औखन चलबे, लक्ष्य सिद्ध अछि मानू।

    तुच्छ प्राण उत्सर्ग अभिलाषक, दीपशिखा अछि ब्याज

    अइसँ नीचा किछु नहि चाही, चाही मिथिला राज॥

    कोन गामसँ पूब ने के अछि, के पूबा, पछिमाहा

    उत्तर-दक्षिण के ने बसैए, के उतरा, दछिनाहा?

    जेठहुसँ केओ जेठ होइत अछि, केओ नहि खाँटी बड़का

    पैघ-छोट सबसँ छी सबक्यौ, केओ नहि छुच्छे छोटका।

    भेद कराबय भेदबा नङटा, ओढ़ि लबादा गाँज

    अइसँ नीचा किछु नहि चाही, चाही मिथिला राज॥

    भाषा-संस्कृति श्री मिथिला के, अपना ढंग सजायब

    नहरि सड़क बिजली उद्योगक, सबतरि जाल ओछायब

    ज्ञान बेद विज्ञानक गरिमा, थिक परिचय मिथिला के

    अवसर एक समानक सपना, थिक अपना मिथिला के।

    मथल शत्रु तेँ मैथिल हम, पुनि देर करक नहि काज

    अइसँ नीचा किछु नहि चाही, चाही मिथिला राज॥

    अपन आँगन, बाड़ी अपन, अपन खरिहान

    तुलसी चौरा नव गोसाउनि, खेतक नवका धान

    नव नीपल गोधन नव घर-घर, गाड़ल नवका मेह

    नव क्षितिज केर नव माटि पर, सबहिक नवका गेह।

    नव समाज, नव ज्योति हेम हित, सिरजल नव खराज

    अइसँ नीचा किछु नहि चाही चाही मिथिला राज॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 31)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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