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जंगलराज

jangalraj

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

जंगलराज

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    (कथाकाव्य)

    जंगलराजक कथा कहै छी, ध्यान लगा कऽ सूनब

    दूसब कि हँसब से, जे मोन होअए से करब॥

    एमहर सूनू कतऽ तकै छी!

    कथा इएह आरम्भ करै छी!!

    जाति शेर के परम आयु थिक बरख तेइस-चौबीस

    जे बुढ़बा राजा छल, से आयु तकर पचीस

    मोट एकटा साँढ़ उठल ढाही जाय लगौलक

    हाड़-घाड़ के तोड़ि शेर के, कत्तहु दूर भगौलक॥

    साँढ़क कृत्येँ घाटा सबसँ, दूटा प्राणीक भेल

    एकटा राजाक चमचा नढ़िया दोसर अपने शेर

    चमचा बाजल—'राजा अहाँक भाग्यलक्ष्मी भागल

    अहाँ के तँ जे से जे हमर पेटमे टाटी लागल॥

    तीन दिनसँ खयलहुँ नहि किछु

    पेटक आँत आब दुखा रहल अछि

    तीनिए दिनक एहन हाल तँ

    जिनगीक चिन्ता सता रहल अछि॥'

    बाजल शेर, ‘अभागल चमचा, ऊघ नहि सगर भविष्यक भार

    विकट परिस्थिति विद्यमान अछि, पहिने वर्त्तमान के टार

    हम तँ असोथकित जीवनसँ, भेड़ खेहारब सेहो ऊहि नहि

    बूढ़ भेने पंजाहु नहि काजक, छागरहु मारब तकर लूड़ि नहि॥

    बुड़बक शिकार आन्हर सुधमुँहा

    कोनो प्राणी जँ कतहु ने तकबेँ

    हम तँ मरबे करब, बूढ़ छी,

    तोंहूँ आयु अछैते मरबेँ।'

    'थम्हू-थम्हू महाराज, हम बन्दोबस्त करै छी

    अपन बुद्धि सँ हड़गर-कठगर एक शिकार अनै छी॥'

    •••

    गदहा एकटा बूढ़ सनक छल, दूर मे कतहु चरैत

    दिन जरल, ऊपर तकैत छल, 'हेंचों-हेंचों करैत।

    जैखन गदहा घाड़ उठौलक

    तुरत आबि नढ़िया फरमौलक—

    'बाझल छलौं हम आन काजमे, अहाँ 'हेंचों-हेंचों' करै छी

    काका, अहाँ हमरे बजबै छी, हम अयलहुँएँ गोड़ लगै छी!!'

    'रओ, हम अभागल, धोबियाक मारल

    तकर इएह नतीजा।

    एहन परिस्थिति, तोँ के अयलेँ,

    के छेँ हमर भतीजा?'

    'काका हमरा नञि चीन्है छी!

    हम तँ अहीँक पड़ोस बसै छी!!'

    'की कहियहु रओ, दिन जरै छै, तँ छाँहो नहि संग रहै छै

    जखन कपार टगै छै बौआ, भाग्यहु चौल करै छै

    केहन दीब कऽ दिन बीतै छल, घरसँ धोबियाक घाट

    कतबो लादय तकर किदन-सन, की छल जीबाक ठाठ॥

    चूड़ीक हाथेँ केहन धोबिनिया, घास मुँह घोसिआबय

    कनिञो मूड़ी झाँटी कि थुथून साटि सोहराबय

    से देख बिनु बातक बातेँ, मुन्ही देलक छिटकाय

    भागल-भागल एतऽ ठाढ़ छी, आगूक कोन उपाय?'

    'काका, भल केलह किछु नहि छुपयलह

    नीक केलह जे कहिए देलह

    तोहर समस्या जत्ते सभटा,

    हमर समस्या थिक।

    औखन यदि काज नहि अएलियहु,

    भातिज तखन कथीक?

    संयोगहु छहु अतिशय नीक,

    सरिपहुँ काका बड़ बुझनीक॥'

    'हओ, देखि रहल छी आइ कएक दिन सँ, गदही एक झमाइए

    हम पुछलियै, कहू अहाँ के, सोनित किए सुखाइए?

    बाजलि, कि कहियहु बौआ, स्वामी गदहा हल्ला कएलक

    भगा देलक ओहि घरसँ, घर अछैत बे-लल्ला कयलक।

    आब किछु हो, कतबहु बौंसत, हम ओकर घर नहि जायब

    आर की हेतै, बरु जे हेतै, नवका घर बसायब।

    से कहै छियहु हओ गदहा काका, हमरा पाछाँ आबह

    पाकल जौ पाथर जुनि पड़ि जाय, चलह घर बसाबह॥'

    आगू-आगू नढ़िया-भातिज, पाछू काका-गदहा

    छान्ह-बान्ह के डरे नहि छल, पहिने छूटल पगहा

    तुरत आयल सिंह जतऽ छल, गञों-गञों पएरे आयल

    जहाँ सोझ देखलक शिकार के, सिंह आँखि चमकायल।

    मारत आब झपट्टा ताऽ गदहाक नजरि पड़ि गेल

    सोझे जान बचौलक, भागल, लत्ते-पत्ते भेल॥

    पाछू–पाछू नढ़िया आयल, 'काका की कयलह?

    रीति-प्रीति किछु करितह से नहि, तिरिया देखि पड़यलह॥'

    'की कहियहु रओ, जहाँ कि देखल, हमरे दिसि तकैए

    गदहीक एहन आँखि नहि देखल, शेर जकाँ चमकैए।

    हमर तँ डरे प्राण सुखा गेल, हम कि किछु गमि पयलहुँ

    जहाँ कि चकमक आँखि देखलियै, सोझे भागि पड़यलहुँ।’

    'आहा काका, तोहूँ रहि गेलह, सब दिन गदहाक गदहा

    सिंगहु रहितहु, सेहो नहि छहु, कान दुनूटा सीधहा।

    हओजी, तोरा देखि फुलायलि, हर्षे चकमक आँखि

    जा कऽ चुम्मा-चाटी करितह, तावत उनटे पाँखि?'

    गदहा के अपन गदहइ के होमऽ लगलै भान

    कहलक, 'हे रओ, अभागलक खातिर रूसि रहथि भगवान।'

    बाजल नढ़िया, 'अइ बेर काका, जोश बना कऽ चलह

    गदही के नखरा जुनि मानिहह, समटि पाँजमे धरह।

    तखन दोबारा फेरो गदहा

    मोंछ पिजा कऽ आयल!

    कि, तुरत मारलक सिंहबा रजबा

    दुनू खूब अघायल!!

    •••

    लोकतंत्र के आइ देशमे, एतबेटा अछि सार

    विकट परिस्थिति जान देबऽ ले, जनता अछि लाचार

    केओ नहि झाँपल आजुक तारीख, सभटा शेर देखार

    नढ़िया जकर जेहन बुधियरबा, चला रहल सरकार॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 70)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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