औरतें उदास हैं आजकल

शैलजा पाठक

औरतें उदास हैं आजकल

शैलजा पाठक

और अधिकशैलजा पाठक

    वह जो काला चश्मा चढ़ाए चला रही है कार

    वह जो रनिंग ट्रैक पर चल रही रुक रही बार-बार

    वह भी जो देर तक गला रही दाल को गाढ़ा कर रही

    वह भी जो बेवजह सेल्फ़ियों में मुँह सीधा-आड़ा कर रही

    वे मंदिर के दीये की तरह बुझ रही हैं

    वे मिट्टी से बनी थीं

    वे नहीं चढ़ाई जा रहीं मोहब्बत के चाक पर

    किसी स्पर्श के सम्मोहन से गढ़ी जा रहीं

    एहतियात से उतारी जा रहीं

    धूप का स्वाद चख रहीं

    नज़र भर टिक रहीं

    वे ढलती उमर पर उफनती नदियों से

    किसी खोह में समा रहीं

    वे तुम्हें रत्ती भर भी समझ नहीं रहीं

    शरीर में पैदा हुईं तमाम नन्ही-मुन्नी बीमारियों पर ख़ुद मरहम लगा रहीं

    वे ही जिनकी उदासी अब तुम्हारे घर में भी नहीं समा रही

    वे आहत की राह देख रहीं

    वे चाहत के ख़्वाब देख रहीं

    वे चाहती हैं प्यार पाना

    वे चाहती हैं तुम्हारे कौर से खाना

    वे चाहती हैं तुम्हारी सुबह में याद-सी शुमार हो जाएँ

    वे चाहती हैं जो पूछते रहो तुम इनका हाल वे बीमार हो जाएँ

    वे चुक गई कमज़ोर डोरियों-सी किसी छत पर काँप रही हैं

    वे डरती हैं अकेले सिर्फ़ इसलिए ये मंत्र जप रही हैं

    सरकार को करना चाहिए इस ओर काम

    रखना चाहिए उदास औरतों का ध्यान

    नौकरी में भर्ती करने चाहिए ऐसे इंसान

    जिनके दिल की धड़कनों के पार वे ख़्वाब देख आएँ

    अपनी उदासी को वे किसी हरे-नीले डब्बे में फेंक आएँ

    सुबह और शाम इनकी ख़ैरियत पूछी जाए

    रात माथे पर रख दिया जाए एक प्रेमिल चुंबन

    चादर को कंधे तक ओढ़ाया जाए

    घर की दीवारों से उतरती आवाज़ सरसराए

    तुमसे ही घर है मेरी जान

    तुमसे ही ज़िंदा है मुहब्बत

    ये जो पेशानी पर उभरी लकीरें हैं

    इन पर ही चल रहा हूँ

    स्याह तालाब-सी आँखों में डूबती-उतरती शाम का हिसाब रखता हूँ

    इतनी उदास मत रहो :

    ढह जाएगा मेरा मकान

    बोलने को और भी झूठ बोल सकते हो तुम

    पर वे ज़रा-सी बात पे मान जाएँगी

    ये ज़रा-सी बात को तरसी औरतों की उदास शाम है

    ये इतनी उदासी लिए आख़िर कहाँ जाएँगी...

    स्रोत :
    • रचनाकार : शैलजा पाठक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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