जब तट पर हमारे आँसू सूख रहे हैं
और मछुआरे अपने जाल घर लिए जा रहे हैं
और सामुद्रिक पंछीद्वीप की तरफ़ लौट रहे हैं
और बच्चों की हँसी दूर होती जा रही है रात के वक़्त,
तब भी अटका रहेगा यहाँ वह भ्रातृ-भाव
जिसे हमने साकार किया,
एकता का वह भोज जिसमें हमने शिर्कत की।
तब भी वहाँ होगा वह शाश्वत दरबान
जो क़ब्रिस्तान के दरवाज़े बंद करेगा
और देर से पहुँचे शोकसंतप्त लोगों को परे हटा देगा।
यह वह संगीत नहीं हो सकता जो मैंने उस रात सुना
जो यादों के ख़ित्ते में अब तक गूँज रहा है,
यह हमारे विस्मृत साथियों का नया कोरस है
और हमारे दूसरे व्यक्तित्वों की जयध्वनि।
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 436)
- रचनाकार : कोफ़ी अवूनोर
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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