एक
समय गुज़रा और वह भूले में शामिल होता गया
न उसने जीना आसान पाया
न मौत ही मौत ही तरह आई
मौत आने से पहले
उसे बहुत धीमी आँच पर सेंकती रही
कला जैसे-जैसे छूटती गई
ज़िंदगी ने उतना ही अधिक निचोड़ा
उसकी प्रतिभा ने उसे ज़िंदगी दी
उसकी प्रतिभा ही उसका हिंसक बनी।
दो
एक अदद-सी ख़ुशी के लिए
कई ख़ुशी के मौक़े मसलता रहा
उसकी धूल पर कई अजन्मी स्मृति का स्वाहा
माँ से किया वादा—
“कम से कम तुम्हें कभी अपनी कला में इस्तेमाल न करूँगा”
और इस वादे पर माँ की मंद मुस्कान...
अपने जल्दी ही भाँप जाते हैं अपनों के झूठे वादे का दोष
वादा निभाना नही आया
हालांकि वादा करना भी नहीं छोड़ा।
तीन
ख़ुद को मैंने देखा ख़ुद के विपरीत हमेशा
जैसे उत्तरी ध्रुव को चाह हो दक्षिण को छूने की
जैसे आकाश को इच्छा हो धरती पर सर टिकाने की
जैसे मन की इच्छा हो सारे सपनों की पूर्ति
बहुत कुछ भी मुमकिन नहीं,
फिर भी इच्छाएँ पालना जुर्म तो नहीं!
देखा जब दूर खड़ा होकर, ज़मीन ढीली पड़ गई
क्या होना था और क्या होता गया!
दोनों के बीच की दूरी में लंबी दूरी
इतना भयंकर सूखा पड़ा आँखों में
रोने पर आँसू नहीं ग्लानि निकले।
- रचनाकार : सुमन शेखर
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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