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बिना व्याकरण के बोली जाने वाली भाषा हो तुम

bina vyakran ke boli jane vali bhasha ho tum

सुमन शेखर

सुमन शेखर

बिना व्याकरण के बोली जाने वाली भाषा हो तुम

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    तुम इतनी दूर रहीं कि कुछ भी कहा नहीं जा सकता

    तुम रहीं इतने पास भी

    कि कुछ भी साफ़ देखा-सुना नहीं जा सकता

    तुम्हारा होना संक्रमण की तरह उतरा है मेरे भीतर

    जब तक पूरा बदन भींगा

    तुम रिसकर चली गई ठीक महसूस होने के पहले

    तुम्हें याद करते हुए

    मैं फिर से अंधेरी गुफा में फंस गया हूँ

    मेरी वास्तविकता बेरंग, बेज़ार है

    जीने के लिए मुझे कल्पना में रंग भरने होंगे

    बहुत कम में बहुत पर्याप्त रहीं तुम!

    तुम बिना व्याकरण के बोलो जाने वाली भाषा हो

    तुम्हारा होना भर काफ़ी नहीं है मेरे लिए

    तुम्हें ठीक-ठीक समझने के लिए

    मुझे तुम्हें फिर से भूलना होगा

    ग़लतियाँ

    अंततः सब सही कर देती हैं न!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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