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बिना तैयारी के

bina taiyari ke

अनुवाद : रीनू तलवाड़

आदम ज़गायेव्स्की

आदम ज़गायेव्स्की

बिना तैयारी के

आदम ज़गायेव्स्की

और अधिकआदम ज़गायेव्स्की

    तुम्हें लाद लेना होगा दुनिया का सारा भार

    और उसे ढोना आसान कर देना होगा।

    झोले की तरह कंधे पर डालो

    और निकल पड़ो।

    सबसे अच्छा समय शाम का है,

    वसंत की शाम का,

    जब शांत पेड़ गहरी साँस लेते हैं

    और रात सुहानी होने का वादा करती है,

    बग़ीचे में गिरी एल्म पेड़ की डंडियाँ चिटकती हैं।

    समूचा भार? ख़ून और बदसूरती भी? नहीं हो सकता।

    ज़रा-सी कड़वाहट चिपकी रहेगी होंठों पर

    और ट्रेन में मिली वृद्धा की छूत-सी निराशा भी।

    झूठ क्या बोलना?

    आख़िर आनंद का अस्तित्व केवल कल्पना में होता है

    और वहाँ से भी जल्द चला जाता है।

    बिना तैयारी के—हमेशा बिना तैयारी के,

    बड़ी हो या छोटी, केवल यही आती है हमें,

    संगीत में एक जैज़ ट्रम्पेट जिस तरह हँसते-हँसते रोता है

    या जब आप कोरे काग़ज़ को ताकते रहते हो

    या अपनी मनपसंद कविताओं की किताब खोलकर

    दुःख को धता बताने की कोशिश करते हो;

    अक्सर तभी फ़ोन बज उठता है,

    कोई पूछता है, क्या आप नया मॉडल आज़माना

    पसंद करेंगे? नहीं, शुक्रिया।

    मैं जाने हुए ब्रांड ही पसंद करता हूँ।

    निराशा और नीरसता बनी रहती हैं; ऐसा दुःख

    जो बेहतरीन मर्सिया भी पिघला सके।

    पर शायद कुछ है जो हमसे छुपा है,

    जिसमें दुख और उत्साह गड्डमड्ड हैं

    निरंतर, हर रोज़, जैसे पौ का फटना

    समुद्र तट पर, नहीं, ठहरो,

    उन लड़कों की हँसी की तरह,

    सफ़ेद कपड़े पहने नन्हे गायक,

    जो सैंट जॉन और मार्क गिरजा के कोने

    पर थे, याद है?

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : आदम ज़गायेव्स्की

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