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भिनसार

bhinsar

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    पुरुब ते फूटि परा भिनसार,

    उषा की लाली लहकै लागि,

    सुर्ज की बैरिनि अँधरी राति

    गई डरिकै पँछुवइ का भागि।

    देखिकै सुरजन का अंगारु

    चन्द्र की किरिला गई भुलाइ,

    लागि खिसियई उड़ी सब चमक

    भगे अपना-सा मुँहु लुकवाइ।

    नखत सब तितिर-बितिर हुइ भजे,

    बीतिगा तिमिरु भवा उजियार

    क्वहिरा की कुछु माया चली,

    गवा छिन माँ सागर के पार।

    सुर्ज का ख्यालति-बाढ़ति देखि

    कमल मुँहमुंदा खिलि-खिलि हँसे,

    लाल पुरयिन, लालइ अग्गासु

    उड़े भौंरा फूलन मा फँसे।

    यहे औसर पर हमहूँ गयन

    करै दुनहुँन का निर्त-नियाउ,

    कहिनि दुनहूँ—हम मा को बड़ा

    जबाना हमका भेदु बताउ।

    कहेन हम—'घूमइ सुर्ज अक्याल

    जगत मा तलिया कमल तमाम,

    मिलइ सुरजन ते सबका ताप,

    कमल ते मिलै ठंढ़ आराम।

    मिला उनका करिया अग्गासु

    मुला यहु पाइसि पानी उजल,

    राति-दिनु दौरति घूमै सुरुज,

    मुला यहु बैठ ठौरहें सदल।

    आजु है बहुमत का कानून

    नही यहिमा तनिकौ सन्देह।

    यहै कहि अपने घर का गयन

    जोरिकै फूलन ते सुसनेह।

    6 सितम्बर 1950

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 23)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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