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भिखारी

bhikhari

निकोलाई रेरिख

और अधिकनिकोलाई रेरिख

    आधी रात आगमन हुआ हमारे सम्राट का।

    चला गया वह ख़ामोशी के भीतर। ऐसा कहा उसने।

    सुबह भीड़ के बीच चला आया सम्राट।

    और हमें मालूम नहीं था...

    हम उसे देख भी नहीं सके।

    हमें ज्ञात कर लेने चाहिए वे आदेश।

    कोई बात नहीं, भीड़ के बीच हम

    उसके पास जाएँगे, बताएँगे और पूछेंगे।

    कितनी बड़ी है भीड़! कितनी सड़कें!

    कितनी राहें और कितनी पगडंडियाँ!

    वह बहुत दूर भी तो जा सकता था।

    क्या वह पुनः वापिस आएगा ख़ामोशी में?

    रेत पर सब जगह निशान हैं पाँवों के।

    हम पहचान लेंगे देर-सवेर—

    किसके पाँवों के निशान हैं ये।

    एक बच्चा जा रहा था इधर से।

    यह देखो—बोझ उठाए एक औरत।

    और इधर—बार-बार गिरता एक अपंग।

    सचमुच, क्या हम सफल नहीं होंगे पहचानने में?

    आख़िर सम्राट,के पास तो हमेशा लाठी रहती थी।

    आओ, पहचान लें उसका सहारा लिए लोगों के निशान।

    यह रहा जुझारू अंत।

    सम्राट की लाठी कुछ अधिक मोटी है

    और चाल—कुछ अधिक धीमी।

    ठीक निशाने पर पड़ेगी इस लाठी की मार।

    कहाँ से टपक पड़े हैं इतने सारे लोग?

    जैसे कि सबने तय किया हो

    पार करना हमारा रास्ता।

    यह लो—हमने तेज़ कर दिए हैं अपने क़दम।

    मुझे दिखाई दे रहे हैं वे भव्य पद् चिन्ह।

    और साथ में वह शांतिप्रिय लाठी।

    यह शायद हमारा सम्राट है।

    हम उस तक पहुँच जाएँगे और पूछेंगे।

    धकियाते हुए हम पीछे छोड़ आए हैं लोगों को।

    हम जल्दी में थे।

    पर लाठी लिए चलता हुआ

    यह सम्राट नहीं

    भिखारी था।

    स्रोत :
    • पुस्तक : निकोलाई रेरिख की कविताएँ (पृष्ठ 13)
    • रचनाकार : निकोलाई रेरिख
    • प्रकाशन : रेरिख अध्ययन परिषद, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1995

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