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भयानक रात

bhayanak raat

ज़ेवियर विलोरूशिया

और अधिकज़ेवियर विलोरूशिया

    रात में हर चीज़ जीती है एक गुप्त संशय,

    चुप्पी और शोर,

    वक़्त और जगह,

    निश्चल सुअक्कड़ या फिर देर तक जागते निद्राचारी

    छिपी हुई व्यग्रता के विरुद्ध हम एकदम असहाय हैं

    नहीं है काफ़ी अँधेरे में अपनी आँखें बंद कर लेना

    या फिर ज़्यादा कुछ देखने के लिए उन्हें नींद में डुबो देना

    क्योंकि गहन अंधकार तथा नींद की कंदरा में

    वही रात की रोशनी ही तो हमें जगाए रखती है

    तब एक जागते हुए सोने वाले का अनुसरण करते हुए

    निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन चलने की शुरुआत करते हैं हम

    रात अपने रहस्य हमारे ऊपर उड़ेलती है

    और बताती है हमें कि मौत को गले लगाना दरअसल जागना है

    एक सुनसान सड़क की छायाओं में से कौन है,

    दीवार में,

    एकांत के नीले दर्पण में

    जिसने ख़ुद को मुठभेड़ की जानिब आते और जाते हुए देखा हो

    और स्वयं को भय, दर्द और नश्वर संशय के बीच पाया हो

    एक ख़ाली देह के सिवाय कुछ होने का भय

    जो किसी के भी भीतर, वह मैं ही होऊँ या अन्य कोई,

    जड़ें जमा सकता है

    और ख़ुद के बाहर स्वयं के जीवित होने का दर्द

    और होने या होने का संदेह बन सकते हैं हक़ीक़त।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : ज़ेवियर विलोरूशिया

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