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भलमंसी का जामा पहिंदे

हम आहिन बड़े भलेमानुस।

चद्दरयि चारि तकिया त्यारह,

मलमल मखमली फूल वाली;

महलन मा मउज उड़ायिति हयि,

अप्छरा नचायी मतवाली।

गुलगुले गद्यालन पर पउढ़े

हम आहिन बड़े भलेमानुस।

पूरी पकवानु मिठाई अउ

छप्पनउ भ्वाग छत्तिस ब्यिंजन

घिउ के कुल्ला हम रोजु करी,

सरि जायिं कठउतिन भरि भोजन—

ह्वयि जायि अजीरन खाति-खाति।

हम आहिन बड़े भलेमानुस

हँयिं गाउँ-ग्यराउँ, जिमींदारी,

दुइ मिलयि खुलीं सक्करवाली

सोंठी साहुन के परप्वाता

हुंडी चलतीं मोहरवाली।

बंकन मा रुपया भरा परा

तिहिते हम बड़े भलेमानुस।

तुम भूँखन मरउ, मरउ भइय्या!

नंगे उघार झख मारि-मारि;

हम तउ मनइन मा द्यउता हन

युहु का जानी करतबु तुमार।

हम पर अनंद रूप बरसयि,

हम आहिन बड़े भलेमानुस।

तुम घामु-लूक की ऊकन मा

तावा अस तपउ-तपउ, ज्ञानी!

पाला, पाथर, पानी भ्वागउ

विधिना की अजभुत बानी।

हम हन पढ़ीस, हम बुद्धिमान,

तिहिं ते हम बड़े भलेमानुस।

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 107)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

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