मुरगा खाइ के दुरगा पूजैं संख बजावैं भाई जी,
दारू पीके रामकथा सबके समुझावैं भाई जी।
मठ भीतर उर्वसी मेनका रास रचावैं भाई जी,
ढोंगी गुरु लालची चेला राह न पावैं भाई जी।
मूड़ मुड़ाए गेरुआ पहिने लोभी भए संन्यासी जी,
योगी ढोंगी भोगी सारे माया के अभिलाषी जी,
छुट्टा साँड़ के जइसे बिचरैं ढूढ़ें बन बन दासी जी
प्रेम न उपजा पाहन दिल में घूमैं मथुरा कासी जी।
उल्टी गंगा बहत बा भइया कलजुग गवा खराई जी,
घर घर में सुग्रीव बालि बिच ठनी लड़ाई भाई जी।
आपन खून बेगाना होइग रिस्ता गवा भुलाई जी,
ड्राइंग रूम में कुकुर रहै पिछवारे बाबू-माई जी।
चारिउ ओरियाँ खड़े दुसासन खींच रहे हैं सारी जी,
कृष्ण अउर दुर्योधन के बिच होइ गइ गहरी यारी जी।
हाथ में कंठी माला फेरइँ मन में बसइ कुमारी जी,
दिन में कन्या पूजन रतिया जाँघ बिठावैं नारी जी।
मुँह से गाँधी बाबा बोलइँ दिल में नाथूराम अहै,
घृणा द्वेष के करैं सियासत नालायक हुक्काम अहै।
देस भक्ति पे भाषण बूकइ भ्रष्टाचारी काम अहै,
मेहनतकस के चुवै पसीना नाहीं कौनो दाम अहै।
बीस डकैती बाइस हत्या करके बने विधायक जी,
जेहिके चाहइँ जमपुर भेजैं जनता के दुखदायक जी।
डोली के रखवार उहै जे लंपट धूर्त नलायक जी,
जाति धरम पे देस लड़ावैं जनगणमन अधिनायक जी।
गोमाता पे सोर बहुत बा घर में भूखी माई जी,
देबी देवता लड्डू चाँपैं बाबू सुधि ना आई जी।
पूजा-पाठ अउर भंडारा में चुकि गई कमाई जी,
ऊँची तेरही भइ दादा के खेतवा गवा बिकाई जी
भइया बहुतै भई लंठई अब तौ होस संभारा जी,
धरम-जाति के झगड़ा छोड़ा बाढ़े भाईचारा जी।
बिटिया-बेटवा खूब पढ़ावा मिटै घना अन्हियारा जी,
हक की करौ लड़ाई बोलौ इंकलाब के नारा जी।
- पुस्तक : अलगौझी (पृष्ठ 66)
- रचनाकार : मोहनलाल यादव
- प्रकाशन : हंस प्रकाशन, नई दिल्ली
- संस्करण : 2023
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