बेसुध औरत

अनूप सेठी

बेसुध औरत

अनूप सेठी

और अधिकअनूप सेठी

    बहुत रात गए एक औरत सुबकती है

    जनरल वार्ड के एक बिस्तर पर

    लगभग बेसुध पड़ी इस औरत को शायद एहसास हो कि रात है

    बीमार और जीवन को किसी तरह बचा ले जाने की थकान ओढ़कर लोग सो रहे हैं

    औरत के सुबकने का भँवर लहराता हुआ बीमारों के सिर के ऊपर से गुज़रता है

    जनता-बाथरूमों वाले कोने से कपड़े पछीटने की आवाज़ रही है

    बेसुध औरत का आदमी रोज़ रात ढाई बजे उठ कर कपड़े धोता है

    सुबकी का भँवर कपड़े धोने की आवाज़ को अपने आग़ाेश में लेते हुए

    वार्ड के बिस्तरों के ऊपर छत को छूता हुआ अटका रहता है हल्की हवा की तरह

    बेमालूम ढंग से यह हवा बाहर की हवा में घुल जाएगी

    बेसुध औरत अपने आदमी की सारी थकान मिटा देना चाहती है

    थपकियों से उनींदी लाल आँखों को कोहेनूर हीरे में बदलना चाहती है

    उसे कुछ पता नहीं चलता

    जब डॉक्टर राउंड लगा कर चला जाता है

    नर्स देगी अब दवा

    एक स्पर्श की चुभन से फूट पड़ती है रुलाई

    फंसे हुए भारी गले की मोटी आवाज़

    वार्ड के बिस्तरों के ऊपर छत से टकराती

    कई मील का चक्कर लगाती निढाल पड़ती जाती

    बेसुध औरत के पिछले दिन धुले कपड़ों की सीलन में जज़्ब होती

    कल इन कपड़ों के साथ उसकी अपनी रुलाई भी चिपकेगी

    बेसुध औरत के शरीर से

    जैसे आज पहने उसके कपड़ों में उसके आदमी की रुलाई की एक परत जमी हुई है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अनूप सेठी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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