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बेरोज़गारों की दोपहर

berozgaron ki dopahar

विशाल कुमार

विशाल कुमार

बेरोज़गारों की दोपहर

विशाल कुमार

और अधिकविशाल कुमार

    सबसे मुश्किल महीना है,

    जेठ का महीना।

    जेठ की दुपहरी

    तपा देती है लोहे तक को।

    सबसे ज़्यादा तपाती है

    बेरोजगारों को।

    बच्चों और महिलाओं के बीच

    जब रह जाता है वह अकेला।

    निष्क्रिय पड़ा अधेड़ उम्र का आदमी!

    और करने लगती हैं जब उनकी आँखें सवाल,

    तो बंद कर लेता है वह अपनी आँखें।

    आँखें बंद कर भी

    फेरता रहता है करवटें।

    पूछता है सवाल अपनी क़िस्मत से,

    चला जाता है वह अतीत के खंडहर में

    अपना खोया भविष्य लाने।

    भूत और भविष्य के बीच

    वर्तमान में मिलता है उसे

    दो वक्त का खाना,

    साथ में भरपेट उलाहना।

    दोपहर के भात में

    मिलता है उसे इंतज़ार।

    जब सानता है वह भात को अपने हाथों से,

    तब भी नहीं मिलता

    उसे वर्तमान का वह सुख।

    सोचते-सोचते

    गिरा देता है वह अपनी आँखों से लोर,

    जैसे ही कोई आता है,

    छुपा लेता है उस आँसू को भी,

    जैसे हो कोई शातिर चोर।

    आदमी होते कैसे दिखाता अपने को कमज़ोर।

    बेरोज़गारी की दोपहर

    तपा देती है अच्छे-अच्छे लोहे को।

    सबसे मुश्किल होती है

    जेठ की दुपहरी,

    उससे ज़्यादा

    बेरोज़गारी की दुपहरी।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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