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बेचैन हूँ

bechain hoon

कंचन बुटोला

कंचन बुटोला

बेचैन हूँ

कंचन बुटोला

और अधिककंचन बुटोला

    बेचैन हूँ।

    पर क्यों? पता नहीं।

    पता नहीं, पर क्यों?

    ये भी पता नहीं।

    पर हाँ,

    ये ज़रूर पता है—

    बेचैनी चुभने लगती है

    दुनियादारी के क़िस्से सुनकर,

    उनके हिसाब से अपनी नाकामयाबी बुनकर।

    बेचैनी चुभने लगती है

    शकुनी, मंथरा और रावण की टोलियाँ देखकर

    रिश्तों की आड़ में छद्म देखकर।

    बेचैनी चुभने लगती है

    मूर्खतापूर्ण आडंबर देखकर,

    धर्म-आस्था को अज्ञानता में रंगकर।

    बेचैनी चुभने लगती है

    अन्याय और असहाय को देखकर,

    निर्दयता-निष्ठुरता में मनुष्य को लिप्त देखकर।

    बेचैनी चुभने लगती है

    पितृसत्ता के भंवर में उलझे समाज को देखकर

    सोच, विचार, संस्कृति सबकी गुलामी देखकर।

    बेचैनी चुभने लगती है

    बेईमानों को देश के कोने-कोने में राज करते देखकर

    स्वार्थ, चोरी और भ्रष्टाचार में फलते-फूलते देखकर।

    बेचैनी चुभने लगती है

    बेमौत मरते जीवों को देखकर,

    मनुष्य की भोग-विलासता का हिस्सा बनकर।

    बेचैनी चुभने लगती है

    पृथ्वी की मातृत्व-सुरम्यता को ग़ायब होते देखकर

    नदियाँ, हवा, जंगल, ज़मीन-सबको नष्ट होते देखकर।

    बेचैनी चुभने लगती है

    मन की अटकलों में ख़ुद को उलझते देखकर

    अँधेरे में रोशनी के लिए तड़पते देखकर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कंचन बुटोला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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