बंधक है उनका वसंत

अनुपम सिंह

बंधक है उनका वसंत

अनुपम सिंह

और अधिकअनुपम सिंह

    बहुत हताश हैं वे

    उनके बोलने में बढ़ गई है अकुलाहट

    मैं क़लम हूँ

    दर्ज करती हूँ

    अकुलाहट का वाक्य-विन्यास

    जो कहते हैं—

    सूरज समदर्शी है

    झूठी है उनकी बात

    चाँदी-सी नहीं

    गर्म सलाख़ों-सी हैं इसकी किरणें

    पीठ को दाग़ती, चीरती

    छोड़ गई हैं अपना निशान

    धूप में जलकर

    बदल गया है चमड़ी का रंग

    इसके आग में पिघल रही हैं

    टीन की छतें उनकी

    और पसीने की बूँदों में

    पिघलती है उनकी देह

    उनके बच्चे छोड़ रहे हैं

    मछलियों-सा सेहरा

    अम्हौरिओं की

    चुनचुनाहट को पीठ में दबाए

    निखहरे सोए हैं बच्चे

    भूख से चिपक गई हैं उनकी आँतें

    साँसें फँसी हैं अंतड़ियों में

    कोरों में जमा है रात का कीचड़

    कीचड़ में बझी हैं कोमल पलकें उनकी

    पत्तों से ऐंठकर

    झुलस जाते हैं बच्चे

    ज़िंदा रहने की ज़िद में

    अधखुली रह जाती हैं उनकी आँखें

    सरकारी आंकड़ों में दर्ज है

    मौत का सार्वभौम कारण

    ‘मौत अटल सत्य है’

    ‘यह संसार मिथ्या है’

    फिर भी वे सिखाते हैं अपने बच्चों को

    जीवित रहना

    मौत से लड़ना

    और अड़े रहना

    सिखाते हैं भरोसा बनाए रखना

    ज़िद्दी बच्चे

    कभी-कभी नहीं मानते बात

    उनकी औरतें

    टीन के नीचे

    टेरीकाट की साड़ी लपेटे

    बेघर और नंगी औरतों से

    ज़्यादा सुखी मानती हैं ख़ुद को

    कि अभी पागल नहीं हुई हैं वे

    उनके गर्भ में नहीं है

    किसी वहशी का रक्तबीज

    वे मनाती हैं—

    इस गर्मी सब ठीक रहा

    तो कट जाएगी बरसात

    बरसात होते ही यह धरती

    भभका मारती है

    गर्म तवे पर पड़े पानी-सा

    छन्न से सोख लेती है

    और औरतें

    ख़ूनी पेचिश से बेहाल हो जाती हैं

    पेचिश से बेहाल औरतें

    महीनों घसीटते चलती हैं पाँव

    वे प्रार्थनाओं में तारों भरी रात

    और जाड़े का आह्वान करती हैं

    कि जाड़े में प्रेम की गर्माहट से

    बिता लेंगी रात

    टी.वी. पर एक ख़बरची

    लगाता है अनुमान

    बर्फ़ का पहाड़ बन जाएँगी

    इस बार सब पनीली चीज़ें

    उनकी थालियों का जूठा पानी जम जाता है

    वे डर से छुपा लेती हैं अपने आँसुओं को

    बर्फ़ के तूफ़ान से अकड़े उनके पाँव

    श्मशानों में आग बीनते

    भटक रहे हैं

    आग ने बदल ली है अपनी जगह

    जठराग्नि बन फैल रही है

    जीवित जान पड़ते लोगों पर

    छोटा होता दिन और सुन्न हाथों से

    अधूरा छूट जाता है काम

    तिहाई मज़दूरी से

    कम नहीं होती उनके पाँव की ठिठुरन

    टीन की छत पर

    तिप्प-तिप्प की आवाज़ में

    गिरती हैं ओस की बूँदें

    बूँद-बूँद रिसता

    आग में जलता है उनका वजूद

    आग के इतने-इतने रूप

    बूँदों के इतने-इतने प्रकार

    चक्कर खाती है उनकी बुद्धि

    अर्द्ध उद्घाटित अर्थों की तरह

    घुट्टी-मुट्टी मारे

    कथरियों में दुबके हैं

    आधे खुले उनके बच्चे

    रात को जब पति से सटकर

    सोती हैं औरतें

    गर्म नहीं होती उनकी देह

    औरतें अफ़सोस करती हैं

    जाड़ों के आह्वान पर

    उन्हें अब इंतजार है बसंत का

    मैं क़लम हूँ

    क्या छुड़ा पाऊँगी

    उनका बंधक बसंत?

    स्रोत :
    • रचनाकार : अनुपम सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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