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बजार-1 बनियाँक रंग मे रंगाइत बजार

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सुमित मिश्र गुंजन

सुमित मिश्र गुंजन

बजार-1 बनियाँक रंग मे रंगाइत बजार

सुमित मिश्र गुंजन

और अधिकसुमित मिश्र गुंजन

    बनियाँक रंग मे रंगाइत बजार

    बजार की छै?

    एकटा एहन दुनियाँ

    जतय लोक, लोक नहि होइत अछि

    संवेदना 'बिक्रू माल' भ' जाइत अछि

    वस्तुक आत्मा रुपैया बनि जाइत छैक

    सभकिछु चिन्हल जाइ छै

    जानल जाइ छै

    अपन-अपन दाम सँ

    एतय मानवताक गप्प कयनिहार

    आत्माक आवाज सुननिहार

    सभकियो वर्जित छथि

    जिनका समय बनियाँ बना देलकै

    एहन लोकक

    बड जोरगर ढंग सँ

    स्वागत होइ छै बजार मे

    जँ बजार छैक

    त' दोकान सेहो छै

    ओम्हर स्टॉल लागल छै

    लोक, लेहाज, सभ्यता संस्कृतिक

    एतय सभकिछु बिकाउ छै

    इमान, मानवता, विश्वास

    वा माटि, पानि, गाछ, भगवान

    सभकिछु

    जँ

    अहाँक क्रय-सामर्थ्य अछि

    लोक सँ माल-जाल धरि

    शासन सँ प्रशासन धरि

    ज्ञान सँ नोकरी धरि

    सभ उपलब्ध रहत

    उचित दाम पर

    सभ देखि

    हमरा नहि होइत अछि

    एक्को रत्ती आश्चर्य

    कियैक त'

    बजार बनियाँ बना देलक हमरा

    हम बनियाँ छी

    सौंसे दुनियाँ हमर बजारक साम्राज्य छी!

    एतय एकटा दोकान अछि

    जतय हम संस्कृति बेचै छी

    सत्य कही त'—

    दोकान नीक चलैत अछि।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पेटकुनियाँ लधने प्रश्न (पृष्ठ 49)
    • रचनाकार : सुमित मिश्र गुंजन
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2024

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