Font by Mehr Nastaliq Web

बहुत कुछ देखा

bahut kuch dekha

कृष्ण चंद्र मिश्रा

कृष्ण चंद्र मिश्रा

बहुत कुछ देखा

कृष्ण चंद्र मिश्रा

और अधिककृष्ण चंद्र मिश्रा

    बहुत कुछ देखा दाज्यू

    मैंने, बहुत कुछ देखा—

    मैं गाँव का सबसे बुज़ुर्ग को जो ठहरा,

    क्या बताऊँ?

    सब वक्त-वक्त की बात है

    मैंने हिमालय की छाँव में

    पीढियों को पलते

    हिम को गलते

    अपने पाले-पोसे जंगलों को

    फलते-फूलते, जलते हुए देखा

    बहुत कुछ देखा दाज्यू!

    बहुत कुछ देखा।

    कितना सुनसान था ये पहाड़

    नहीं कोई मनुष्य,

    थी तो यहाँ बस, शान्ति - शान्ति - शान्ति

    वक्त का पहिया घूमा

    चल पड़ा समय का रथ

    देश के कोने-कोने से

    दबाए-कुचले-सताए लोगों ने

    पहाड़ों की ओर अपने क़दम बढ़ाए

    घनघोर जंगलों को पार कर

    पहुँचे, पहाड़ों की वादियों में

    तो उनका मन यहीं रम गया

    जिसने जहाँ पानी का सोता देखा

    वहीं झोपड़ी डाल ली

    बन गया किसान

    चल पड़ी उसकी कुदाली

    पहाड़ को काटकर पसीने से सींच,

    बनाए खेत, बोये बीज

    तो जीवन में जरा ठहराव आने लगा

    और

    पहाड़ में रहने वाले हम पहाड़ी हो गए।

    बहुत कुछ देखा दाज्यू!

    बहुत कुछ देखा।

    प्रसव वेदना से रोती हुई, घुघुती

    पूस ठँड में काँपती हुई, घिनौड़ी

    सुरम्याली आँखी, रंगदार पिछौड़ी

    मयाली मुखड़ी,

    फूलों-सी कोमल जिकुड़ी को देखा

    बहुत कुछ देखा दाज्यू

    जो भी कुछ देखा।

    रूखी-सूखी ज़िंदगी में

    प्रेम की बिरवा उगते,

    नज़रों को मिलते,

    नज़रों को झुकते

    राह में चलते बटोही, रास्तों को ठहरते

    चौमास की गंग को रूड़ में सूखते हुए देखा।

    मेले खौलों की रौनक देखी है इन आँखों ने

    होली के गीत, माया की गाँठे

    रिवाज-रीत, अधूरी प्रीत

    चिर प्रतीक्षित यौवन,परदेशी साजन/जीवन

    बहुत कुछ देखा दाज्यू!

    बहुत कुछ देखा।

    कुँडलियों को जुड़ते, सिरों को मूँडते

    भोटिया पड़ौ, बल्दी पड़ौ, ब्याखुली पड़ौ,

    जाने क्या-क्या जो नहीं देखा?

    दुल्हन लाने से लेकर,

    चिता जोतने तक की एकता

    देखी है मैंने।

    जात बिरादरी का धीरज देखा

    जिसने किसी

    अदने बिरादर के आने से पहले

    भात का सींता भी नहीं तोड़ा।

    और देखे मैंने

    बड़े-बड़े भड़-पैक

    जिन्होंने सात पुस्त पुराना

    दुश्मन भी नहीं छोड़ा

    मेरी आँखें दाज्यू!

    स्रोत :
    • रचनाकार : कृष्ण चंद्र मिश्रा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    संबंधित विषय

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY