Font by Mehr Nastaliq Web

बादर

badar

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    आइ रहे यहि बार कौन यहि बड़े सवारे?

    चमकि रहे हैं कौन भूतु अस कारे-कारे?

    बड़का धनुहा लिहे संग मा रंग-बिरंगा,

    डहुकैं मनौं परेतु मचावति आवति दंगा।

    भारी सैना साथ एक ते एकु बहादर,

    वीर लड़ाके ज्वान, कहावैं जग मा बादर।

    आँखिन के कमजोर, दौस मा लैट लगावैं,

    मुँहि पर फेंकि उजेरु, सबन पर सान जमावैं।

    सुरजन पर जुटि गये, जेलि छिन मा पहुँचाइनि,

    जग मा किहिनि अँधेरु, ताल की डाह बुताइनि।

    फँसा जेलि मा जानि, सुर्ज जब धूप बढ़ाइनि,

    मारिनि मूड़े गदा, अकट्ठै, रकतु बहाइनि।

    छूटै लागि फुहार, छिनै मा खोक्खडु हुइगे,

    बहिगा सिगरा रकतु; हाँड़ के ढाँचा रहिगे।

    त्यहिका लइके हवा, समुन्दर बीच डुबाइसि,

    दिहिसि झम्म ते फेंकि, अमृत दे फेरि जियाइसि।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 32)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY