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बाप-1

baap 1

श्याम दरिहरे

और अधिकश्याम दरिहरे

    हम हमर बेगरता

    शामिल छल,

    हमर बापक हकमैत साँसमे

    जे अभावक संकटपूर्ण मैराथन

    दौड़ैत रहलाह सबदिन।

    हुनकर फिफिआयल मोनक संताप

    छिछिआइत दिनचर्जाक गवाह तँ छीहे

    जे

    हुनकर घामक गंध जानल अछि

    चिन्ताक प्रकोपें झड़ैत हुनकर

    एक एकटा केश अछि गनल

    बेमायक गहिराइ सेहो नापल अछि।

    अनेक समुद्र उपछलनि

    सबटा भुतहा पाँतर नँघलनि

    मात्र हमरा बैसाबऽ लेल घोड़ाक पीठ

    सत्ते

    एकदिन हम घोड़ा असवार भऽ गेलहुँ

    दौड़य लगलहुँ सरपट

    जा घुरि देखलहुँ पाछु

    ने बाप छलाह ठाढ़

    ने भेटल हुनकर कोनो कामना।

    अपन अभावमे समा गेलाह

    हमरा स्थापित करिते-करिते

    अपने बिला गेलाह।

    आइओ जखन मोन पड़ैत छथि तँ

    हमर सूटबूट

    हुनकर ठेहुनिया धोती लग

    झुझुआन लगैए

    हमर आडम्बरक दौड़ा-दौड़ी

    हुनकर अभावक घुसकुनियाक आगु

    नितुआन लगैए।

    स्रोत :
    • पुस्तक : क्षमा करब हे महाकवि [मैथिली कविता-संग्रह] (पृष्ठ 13)
    • रचनाकार : श्याम दरिहरे
    • प्रकाशन : नवारंभ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2016

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