बादल राग

badal rag

अवधेश कुमार

अवधेश कुमार

बादल राग

अवधेश कुमार

और अधिकअवधेश कुमार

    बादल इतने ठोस हों

    कि सिर पटकने को जी चाहे

    पर्वत कपास की तरह कोमल हों

    ताकि उन पर सिर टिका कर सो सकें

    झरने आँसुओं की तरह धाराप्रवाह हों

    कि उनके माध्यम से रो सकें

    धड़कनें इतनी लयबद्ध

    कि संगीत उनके पीछे-पीछे दौड़ा चला आए

    रास्ते इतने लंबे कि चलते ही चला जाए

    पृथ्वी इतनी छोटी कि गेंद बनाकर खेल सकें

    आकाश इतना विस्तीर्ण

    कि उड़ते ही चले जाएँ

    दुख इतने साहसी हों कि सुख में बदल सकें

    सुख इतने पारदर्शी हों

    कि दुनिया बदली हुई दिखाई दे

    इच्छाएँ मृत्यु के समान

    चेहरे हों ध्यानमग्न

    बादल इस तरह के परदे हों

    कि उनमें हम छुपे भी रहें

    और दिखाई भी दें

    मेरा हास्य ही मेरा रुदन हो

    उनके सपने और उनका व्यंग्य हो

    घोरतम तमस के सच में

    विजन में जन हों अपनेपन में

    सूप में धूप हो

    धूप में सब अपरूप हो

    बादल इतने डरे हों

    कि अपनी छाती पर

    मेरा सिर टिकने दें

    झरने इतने धारा प्रवाह हों

    कि मेरे आँसुओं को पछाड़ सकें।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अवधेश कुमार
    • प्रकाशन : कविता कोश

    संबंधित विषय

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY

    जश्न-ए-रेख़्ता (2023) उर्दू भाषा का सबसे बड़ा उत्सव।

    पास यहाँ से प्राप्त कीजिए