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आज़ादी के उपलक्ष्य पर

azadi ke uplakshya par

अर्पिता धमीजा

अर्पिता धमीजा

आज़ादी के उपलक्ष्य पर

अर्पिता धमीजा

और अधिकअर्पिता धमीजा

    मैं लिख रही हूँ,

    आज़ादी पर

    आज़ादी के उपलक्ष्य पर

    मैं लिख पा रही हूँ,

    आज़ादी पर!

    मैं त्याग पा रही हूँ,

    उस विरोधाभास को

    जो मेरा मेरे होने के बावजूद

    करता था ये तय

    कि मैं ख़ुद की तो नहीं।

    मैं पीछे छोड़ रही हूँ,

    कुछ बंधनों को

    जो शरीर के नहीं थे

    ना ही आत्मा के

    मगर यक़ीनन कचोटा होगा उन्होंने

    शरीर को भी, आल्मा को भी

    मैं पीछे छोड़ पा रही हूँ,

    बंधनों को, विरोधाभासों को

    आत्मविश्वास से, अपने होने के एहसास से

    आज़ादी के उपलक्ष्य पर।

    मैं लहू से लिखी इक कहानी

    के किसी किरदार के

    यक़ीनन उस हिस्से के

    किरदार में हूँ,

    जो हिस्सा छूटा था

    आज़ादी के उपलक्ष्य में

    जो हिस्सा मुझे मिल पा रहा है अब

    आज़ादी के उपलक्ष्य पर

    मैं ख़्वाब हूँ इस पल

    उस पल का

    जिसका होना अस्पष्ट था,

    इक पल पर!

    मैं रंग हूँ,

    जो मिलता है

    धरा, आकाश और जल को

    और जिसका समावेश

    जाने कितने ही रंगों का मेल है

    जो समावेश समाहित है

    मेरे होने में

    जो समावेश है

    आज़ादी, और हिंदुस्तान।

    मैं लिख पा रही हूँ

    इस समावेश को

    आज़ादी के उपलक्ष्य पर

    ये समावेश है स्वर्णिम

    क्योंकि ये प्राप्त है

    आज़ादी के उपलक्ष्य पर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अर्पिता धमीजा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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