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आत्मबोध

atmabodh

श्याम दरिहरे

श्याम दरिहरे

आत्मबोध

श्याम दरिहरे

और अधिकश्याम दरिहरे

    कथीक अछि धड़फड़ी

    कथीक हड़बड़ी

    जा रहल छी भागल कतय

    अपस्याँत

    बुझले तँ अछि जे

    एहि जतराक तँ रस्ते छै

    आगु बन्न

    तखन कनैत छी किए हकन्न

    लऽ कऽ एते नमहर पाथेयक मोटरी।

    चारिए दिनक तँ जतरा

    तकर बाद

    केहन अपन, केहन आन

    कोन सुविधा, कोन खतरा।

    हे देखिऔक!

    संगक कतेक बटोही उपासले

    कोना टग हनैत छै जा रहल

    हे! अपन झोड़ासँ

    दिऔक थोड़ेक बाँटि

    हल्लुक करू बोझ

    आब नै अछि बाँचल

    बेसी बाट

    तकर बाद तँ

    दूरिए हैत सबटा ठाठ।

    सौंसे जतरा तँ

    बोझे तर पिचाकऽ गेल बिति

    कहाँ भेटल बाटक आनन्द

    मीठ कि तीत

    मोन होइअए हल्लुक देह कऽ कऽ

    बैसी कने काल निश्चिन्त भऽ कऽ

    गुनी अपन नेकी

    गनी अपन बदी।

    ठेहिआयले देह लऽ कऽ की जायब

    मौलायल फूल कोना चढ़ायब

    आउ नहा ली फेरसँ

    अइ सन्तोषक पोखरिमे एकबेर

    त्यागिकऽ सब दूषित शस्त्र

    निकालू झोड़ासँ

    पहिरि ली फेरसँ

    अपन झकझक श्वेत वस्त्र।

    स्रोत :
    • पुस्तक : क्षमा करब हे महाकवि [मैथिली कविता-संग्रह] (पृष्ठ 57)
    • रचनाकार : श्याम दरिहरे
    • प्रकाशन : नवारंभ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2016

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