रामनिहोर के अटूट आस्था आ गुमान छै
गतिशीलताक गबाही
आ सभ्यताक आदिकालक
विकासक प्रतीक
अपन नचैत चाक आ आङुरपर
ओकर आस्था नै भखरै छै
कि ऐ दूनूक अछैत
ओ आ ओकर पूरा परिवार
भूख स' नै मरि सकै छै
आ अही आस्थाक बुत्तापर
ओ माटिक उपयोगी
आ सुन्दर समान बना लैए
ठीठर के अटूट आस्था छै
अपन बांहि आ डांग करूवारिपर
कि जावत इ दूनू दीढ़ छै
भुखमरीक कछैरपर
नै पहुँचत ओ
आ सगर परिवार
सरिपों, कत्ते वफादार आ पावन छै
ओकर इ दूनू जिनीस
जे दोसर के पार उतारै छै
पार करै त' नै छै
मंगल के अटूट आस्था आ गुमान छै
अपन गट्टा आ रूखान-बैसलापर
सरिपों कत्ते पावन छै ओकर ई जिनीस
ओ निष्पद आ बेढब काठ के
सुढब रूप दैए
ककरो करेज त' नै ने तरासैए
टोटन के अटूट आस्था आ गुमान छै
सरिपों ओकर लोखर
कते पावन छै
अस्तूरा आ कैंची स'
ककरो घेंट आकि गेंठ त'
नै कटैए टोटन
ओतै टोटनक पढुवा बेटा के
अपन कैंची आकि कलम पर आस्था कि गुमान नै छै
पैर तर धरती नै असमान छै
हाथ रहैत आरक्षित विकलांग-ए
चौबटिया आ पुलियाक
अदना स्थायी समाङ-ए
वास्तवमे जकरा अपन कर्मपर
नै छै आस्था
ओ त' आस्था खाली ओढ़ै-ए
एगो कल्पनाक आरोपनमे
कर्मरत आस्था के खाली तोड़ैए।
- पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 52)
- रचनाकार : राज
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
- संस्करण : 2011
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