असीम है यह संपन्नता बिखरी हुई
asim hai ye sampannta bikhri hui
न ये हाथ न स्पर्श उसका
है सुखों का आधार तुम्हारा
रस्तों के उस पार एक और आसमान है इंतज़ार में तुम्हारे
आकाश के पार हमेशा ही खिलते हैं नए पौधे, मिलते हैं नए तट
अनंत है, असीम है यह संपन्नता बिखरी हुई।
मत सोचो कि फिर न आएगी यह सफेन भोर,
हर मुखड़े के बाद दूसरा मुखड़ा रहता है,
तुम्हारे प्रेमी के जाने के बाद,
उस संगीतमय मिलन के बाद बनी रहेगी एक नई उत्तेजना
हर भोर छुपाती है अनसुने अल्फाज़, दूर के द्वीप भी,
ऐसा ही होता रहेगा सदा।
तुम्हारे सपने ने सब कुछ कह दिया, सोचते होगे तुम कभी,
पर एक और सपना फिर बनता है कुछ हटकर
तब तुम फिर हो जाते हो भरोसे अपने हाथों के, हृदय के, अपने, या किसी और के,
तुम तुम नहीं तब, वे वे ही नहीं रहते,
दूसरे जानते हैं शब्द को, तुम उसकी करते उपेक्षा
दूसरे जानते हैं भूल जाना अनावश्यक घटनाओं को
दिखाते हैं अँगूठा, भुला देते हैं सब कुछ
तुम्हें तो वापस आना है निराशाओं के बावजूद।
अनंत है, असीम है यह संपन्नता बिखरी हुई
प्रेम का, धिक्कार का, हर भाव हर रूप,
सुखी क्षणों में, दर्द में, शेष या, शुरुआत
गुज़रेगा चुभती हवा से, गिरे सितारों के बीच से,
भोजवृक्ष का एक काठ-मुखौठा, आने वाले कल को पहले ही देख लेता है
तुमने तो देखना चाहा था
दिन-काल के उस पार, और हुआ भी ऐसा कुछ-एक बार
बहती बहती नदी पहुँच गई देवों तक
दूर से उठती वह सरसराहट, आलोकित इस जीवन पल में
दे जाती है आशंकाएँ
शीत में समुज्ज्वलता समान
उम्मीद भरो
तो सिर्फ़ उस राह की जो उज्ज्वल हो या दुःखद हो।
अनंत है, असीम है यह संपन्नता बिखरी हुई।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 36)
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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