उद्दण्ड गंडक सैतल अबस्से जायत।
छतहड़ी कमला न पुनि फुफुआयत
लक्ष्मणा, तिलयुग, धेमुड़ा, तिलाबय, कानकेइ बलान
राक्षसी सन कौसीकीकेर सठत सभ अभिमान।
झाउ बंकाकेर बनमे फेरि खेड़ही धान
मकै मड़ुआ साम मखड़त।
करमी चिचोढ़ केसौर छारल चऽरमे
विहुँसत सरोज मखान।
होयत निकन्नन कास
बनत नव खरिहान
बिलसत मजरसँ फेरि आमक बाग।
करत आमोदित दिशाकेँ ओकर मधुर पराग॥
औत घुरि मधुमास असली
बहुरि औत हाँक कोइली
जकर मधुमय गीतसँ छल
मुग्ध बंग, असाम, उत्कल।
फेरि घर-घरमे बनत मञ्जुल त्रिवलि सोपान।
बक्षबेदीपर रहत घर-घर घयल
स्वर्ण नीलमकेर घटमे पूर्ण
बात्सल्य बासित सुधा मधुमय
पिबि अछिनरे मस्त मखड़त
भावी रत्न-प्राण देशक।
कानत मूर्खता अनहार
रहत नहि पुछऐल दाबल
क्यो तुअ सन्तान
गुलामीसँ मरि जाइत छै आत्मा मनुष्यक
स्वाधीनताक प्रेम
साहित्य संस्कृतिकेर महत्व
नहि बुझैछ गुलाम।
नीक भोजन वस्त्र-गहना
रहै छै परमार्थ ओकर हेतु।
तेँ अहाँकेँ अम्ब! निरधन जानि
अछि सेबैत आनक द्वारि।
स्वतंत्रताक संवाद बुझितहि
तकरो हृदयमे जगतैक गामक मोह
औतै अहाँकेर सोह
आबि लागत गोड़
बिसरि पछिला ओकर करनी
मा! अहाँ लय लेबैक हँसइत कोर
लोभसँ बाँचल रहत से होइछ जगमे थोड़।
अहाँकेर ओहि शुभ घड़ीमे
भय हर्षविभोर हमहूँ
छाड़ुसँ रहबैक अम्ब हँसैत
•••
गदहाक माय सन छौक जीवन तोर
व्यर्थ छौ सन्तान दू कड़ोर!
तोहर मुखकेर लालिमा राखैक हेतुक
भेलहु नहि बलिदान एको व्यक्ति।
एहन उलहन दय सकत नहि आब तोरा
उद्धार जँ नहि कय सकब तँ
दऽ देब निश्चय जान।
वैभव न अछि, नहि शक्ति दैहिक
ताहिसँ की?
हृदयमे फड़कैत पौरुख
स्वाभिमान, सजग
तोहर मानमे अछि लीन तन मन जान
कहै छी हम खीचि रेखा तीनि
नहि कोनो अछि शक्ति जगमे—
जे करत भयभीत अथवा लेत हमरा कीनि।
- पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 34)
- संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
- रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
- प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
- संस्करण : 1989
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