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आएल अषाढ़, आएल अषाढ़।

भए गेल तिरोहित गृष्म-गाढ़॥

झर-झर झर-झर झहरए फुहार।

खुजि गेल प्रकृति-मन्दिर-द्वार॥

कए रहल कमल मुसकान-दान।

दादुर, झिङ्गुर विरुदक बखान॥

हीतल शीतल, सुख ओत-प्रोत।

टुटि चलल नदी-नद-प्रेम-स्रोत॥

वन-वीथीमे मञ्जुल विकास।

कलिका-कलिकामे मधुर हास॥

नहि शुष्क, विपट-अधर-प्रदेश।

छलकए छल-छल अमृत अशेष॥

केतकी, कुटज लुटबए पराग।

जागल कदम्बहुक सुप्त भाग॥

अछि मान-हीन प्रणयिनी-प्राण।

कुलटा-चपला क्रोधित महान॥

गर्जए-तर्जए तजि लाज घोर।

सुनि-सुनि नाचथि अति मुदित मोर॥

आहा! वसुधो छथि प्रेम अन्ध।

उड़ि रहल हुनक वासना-गन्ध॥

सर्वत्र भरल उल्लास-हास।

आशान्वित अछि चातक निराश॥

करपूर भेल प्रणयीक रोष।

गुणमे परिणत एहि काल दोष॥

कतिपय अबला केँ साधि-साधि।

लेलक विरहो चिरतर समाधि॥

नीरस जीवन भए सरस गेल।

कामना-विटप फल फूल भेल॥

लहलहा उठल तृण-राशि-जाल।

पुलकित समान, बक की मराल॥

अनुरागवती कल्पनो आइ।

हुनकहिँ हाथेँ हमहूँ बिकाइ॥

“जनि रहथु आब 'मैथिली' दीन।

पावसमे के सुषमा-विहीन?

सत्वरहिँ हएत नैराश्य-नाश।

कविता-कानन कोकिलक वास

कवि मङ्गल-साधन साधि लेथु।

वीणा-वादिनि वर-दान देथु॥

'भुवनेश'! पूर्ण हो जगक आश।

'भुवन'क नित नव प्रतिभा-विकास॥

स्रोत :
  • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 105)
  • संपादक : अजीत मिश्र
  • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2024

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