जब देवता हमें छोड़कर चले गए, कौन रह गया पता ही है।
उतर आया ध्वजों से हमारे हृदय में।
फिर सर्वत्र, अनाज के दानों में जिन्हें हम बोरों में
डेक के नीचे एक किनारे से दूसरे ले गए।
भला हमारा सहोदर, स्वास्थ्य का प्रतीक बन गया,
कारण उस सबका जो हमने आविर्भाव से लेकर
अब तक सपनाया,
मेज़ पर की हिदायतें, कैसे शांत बन जाता है, सुखी, बुद्धिमान,
और कहाँ ले जाते हैं सुंदरता के पंख।
उपस्थित दृश्य के समय नहीं बोला ये लो, ये मृतक है
और समय के साथ इनकी संख्या बढ़ेगी, ओ स्वतंत्र मानव।
बल्कि, मुक्त होना चाहिए दुर्भाग्य से और हर भय से।
उसकी चिकनी जीभ पर सदा ताज़ा ख़याल थे।
उसको दुश्मन नहीं मान सकते, वह सहिष्णु था।
आरंभ में तो हमारी जान बचाई, गर्म चाय से ढाढ़स बंधाया,
इतना सभ्रांत था हमारे शरीर के प्रति कि तूफ़ान के अंत
हमने स्वयं से उसका भेद न किया।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 169)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : दानियल द्रगोयेविच
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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