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असमय

asamay

ब्लांका वारेला

और अधिकब्लांका वारेला

     

    I

    गुज़र गया दिन

    घूमने लगे सपनों के शल्क

    डूबता सब कुछ

    और रात

    सिर्फ़ एक उबाऊपन

     

    रेगिस्तान में, रात के धुँधलके में,

    प्रेम से घबराई

    रोती है सीप अकेले में

    गिरते हैं पत्ते निष्प्रभ, माथे से तेरे,

    और दूर हो जाता है तू

    एक काला बुलबुला लक्ष्यहीन

     

    खुल जाती है अचानक हज़ारों राहें,

    लपटों में घिरा मूँगा

    तेरे बर्फ़ीले शरीर को सँभाले आँसू की तरह

    तुझे छू नहीं सकता कोई,

    अपने पंजे गड़ा देता है मूँगा तेरी छाया में,

    बह निकलता है लहू तेरा, डुबोता मैदानों को,

    खिड़कियों से कूदता किसी लाल आवाज़-सा

    हाँ कुछ भी नहीं यह सब

    पतझड़ के सिवा।

     

    III

     

    सेसार मोरो के लिए

    महका दिया है किरण ने

    हमारे घर को भरपूर

    प्यासे हैं हम है जल्दी हमें वार करने की

    अंधकार पर

    एक फूल की हड्डी से।

    इस कहानी में है

    एक कटा हुआ पेड़

    हम नज़र दौड़ाते हैं आकाश पर।

    कहीं कोई निशान नहीं।

    क्या यह दिन है? या फिर रात?

    मर गई वह मकड़ी जो नापती थी समय,

    अब तो बस एक पुरानी दीवार है

    और छायाओं का एक नया परिवार।

     

    VII

    वह सारा अनबूझ पीलापन यादें हैं।

    चौराहा दीवारों से दीवारों तक,

    एक अंतहीन गहराई हैं पलकें,

    पोतभंग होती है जहाँ यह धरती

    उजड़ जाती है एक आँसू से।

     

    VIII

    जाग उठती हूँ मैं।

    अंतःकरण का यह पहला द्वीप : एक पेड़।

    भय की ईजाद है यह उड़ान

    आश्वस्त हूँ यहाँ, यह जाना-पहचाना रेगिस्तान।

    नज़र डालता है मुझ पर कोई उदासीन भाव से

    (दूर उस बंदरगाह पर आश्रित)

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 57)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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