शास्त्र ज्ञान, सामर्थ्य
सहनशीलता, संयम,
सत्यनिष्ठता अनुशासन केर प्रतिमान
भारतवर्षक गरिमामय इतिहासक चूड़ामणि!
हे अर्जुन!
देखि अहाँक चरित्र-विचित्र
विस्मित छी भय जाइत!
अक्षौहिणी अठारह सेनाक मध्य
क्यो नहि रहय अहाँक समान
शस्त्र शक्ति कौशलमे।
कते परिश्रम करय पड़ल छल होयत
एहन निपुणताकेर अर्जनमे?
अद्भुत लक्ष्यबेध कय अर्जल
द्रुपद महाराजक कन्या सुकुमारी सुन्दरी
के तुच्छवस्तु सन भैयारीमे लेलहुँ बाँटि
मायक बात पर।
केँ अछि दोसर भेल अहाँक समान
मातृदेव वास्तविक अर्थमे?
सौन्दर्यक उपमान उर्वसी
इन्द्रक विलासमय महलक भीतर
मदन विह्वला एकसरि दुपहरि रजनीमे
डोला सकलि नहि चित्त अहाँक!
पंडित सबहक
अनुभाव विभाव संचारिभाव
कानि कलपि मरि गेल
अहाँक संयमी मनक निकटमे।
सुनितहि गोरक्षाक गोहारि
संकल्पक पालन लग्न अहाँक मन
बिसरि गेल सुधि संसारक
शस्त्र मात्र छल
कयने आक्रांत
अहाँक ध्यानकेँ
तेँ चलि गेलहुँ जेठ युधिष्ठिरकेर
शयन कक्षमे
भय गेल व्यवस्था केर उल्लंघन
तँ स्वयं ग्रहण कय लेलहुँ दंड
बारह वर्षक देशनिकाल।
अनुशासनकेर एहन
परिपालन, नहि भेटि सकल अछि अनतय
मुदा कुरुक्षेत्रमे रूप अहाँक
छी पबैत
ज्ञान विवेक विहीन, यन्त्र समान लड़ैत
भातिज भाय, मामा बहिनो
गुरु पितामह
सबहक करइत खून
नरहत्याकेर संख्यासँ
करइत अपन प्रतिष्ठा केर संस्थापन!
ठूठमूठ प्रपने पाँचो भाँइ
टा रहल छलहुँ बाँचल।
ने क्यो दूर्वाक्षत देनिहार
ने क्यो जय जयकार
करबैया रहि गेल!
पुत्रक मरणेँ व्याकुलमना सुभद्रा पांचाली
विधवा पुत्रवधू उत्तराक संग मिलि
कोन रागमे गओने होयती गीत
चुमौन कालमे?
जाहि कौशलेँ पातालक जल
भीष्मक हेतु निकालल
यदि करितहुँ उपयोग तकर
शान्तमने, तँ की नहि भय जाइत
ऐ देशक मरुभूमि
शस्येँ हरिअर नयन मनोहर?
मानव हितकारी कोन कीर्ति कय सकलहुँ
अहाँ अपन
अतुलनीय पराक्रम बलसँ?
अहाँक महत्वक परिचायक
अछि आइ
अन्धाधुन्ध नरहत्याकेर
गाथा मात्र किने?
- पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 8)
- संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
- रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
- प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
- संस्करण : 1989
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