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अर्जुन बनना पड़ता है

arjun banna paDta hai

कंचन बुटोला

कंचन बुटोला

अर्जुन बनना पड़ता है

कंचन बुटोला

और अधिककंचन बुटोला

    स्त्री तुम अर्जुन बनोगी,

    तो ही कृष्ण आएँगे

    अँधेरे में उँगली पकड़कर

    भवसागर पार लगाने।

    दुनिया के कुचक्र में

    जूझना पड़ता है,

    प्रश्न पूछना पड़ता है।

    हर साँस में प्रश्नों की धीमी-सी लौ

    जलानी पड़ती है।

    कृष्ण से मिलने के लिए

    अर्जुन बनना पड़ता है।

    बेहोशी से आँख चुराकर प्रश्नों पर अडिग

    दुनिया के रंगरोगन, मन के छलावे से बचकर,

    जीवन को सड़े सरोवर से निकालकर

    भीतर बैठे डर को सामने से महसूस करना पड़ता है,

    थरथराते, काँपते हाथों को प्रत्यक्ष देखना पड़ता है।

    कृष्ण से मिलने के लिए अर्जुन बनना पड़ता है।

    क्षणिक मोह से बुना अतीत छोड़,

    सत्य का विस्तार करना पड़ता है।

    ख़ुद को प्रश्नों के घेरे में,

    आत्मज्ञान के फेरे में,

    बेचैनी की आग-सी तपस में तपना पड़ता है।

    जीवन को सार्थक करने के लिए,

    अपनी छाया से परे

    आत्म-काया को निरंतर निखारना पड़ता है।

    संघर्षों में आनंदित हो

    स्त्री से आगे स्वतंत्र मनुष्य बनना पड़ता है।

    कृष्ण से मिलने के लिए अर्जुन बनना पड़ता है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कंचन बुटोला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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