अपरिचित काव्य-पुरुष
aprichit kavya purush
एक लंबा आदमी दीखा। दुबला-पलता और निर्वस्त्र। उसकी चमड़ी पर
किसी हाथी के जैसी सलवटें ही सलवटें थीं और उसका शिश्न किसी
दिशासूचक तीर की भाँति ज़मीन की ओर रुख़ किए था। उसके चेहरे में
आँखें नहीं थीं, बल्कि दो अखरोट थे। उनका उपयोग वह दरख़्तों और
पहाड़ों और औरतों को देखने में करता होगा। उसकी टकटकी में एक
ख़ुशबू थी, जैसी ख़ुश्क हवा में होती है। उस टकटकी को पी लेने के
लिए मैं उसके और जंगल के दरमियान खड़ा हुआ। लंबा आदमी धीमी
आवाज़ में बोला, मानो थका हुआ हो, 'मैं वस्तुतः काव्य-पुरुष हूँ',
उसने कहा। जब वह घूमा तो मुझे नज़र आया कि उसकी पीठ की भूरी
मटमैली जगह पर शब्द अंकित थे। वे शब्द हू-ब-हू छोटे-छोटे ज़ख़्मों
जैसे दिखाई दिए और मैं उनका अर्थ नहीं पकड़ पाया। फिर भी दो या
तीन ताज़ा हरूफ़ों से हल्का-हल्का ख़ून रिस रहा था और बह-बहकर
उसके चूतड़ों पर आ रहा था। और मैं बिल्कुल ऐसी पोजीशन में था कि
जीभ से चाट सकूँ।
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 403)
- रचनाकार : शुन्तारो तानीकावा
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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