अपनी ज़मीन

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उपांशु

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    हरे समंदर की करियाती गहराई आवास जिस किसी दैत्यकायी जंतु का हो आसरे से बढ़कर और क्या हो सकता है?

    क्या आसरा नहीं छोटी-छोटी ईंटों के ये दैत्यकायी मकान दीवारों पर अमूमन खोई रहने वाली छिपकलियों का?

    कल्पना, आसरों पर अपने अधिकार की, उन्माद जब भरने लगी मानवीय इंद्रियों में शक्ति के प्रदर्शन की—अम्बर तले पसरे पाताली गहराइयों में सभा क्यों नहीं बुलाई गई कंकड़कायियों और पर्वतदैहियों की?

    मुझे बताया था तुम्हीं ने कभी कि इलाक़ों में कुत्तों और जंगलों में शेरों के मूतने की आदत शक्ति-प्रदर्शन नहीं इतिहास है अटूट प्रेम का।

    भीड़ का उन्माद और शेर का विलाप, खाई भर दूरी सलाख़ों की मजबूरी, निश्चित यही इतिहास है कि घर लौटते ही अपने कुत्ते को पुचकार लेने के बाद सुर बिना बदले तुम करते हो चाय की गुहार और मैं सोचती हूँ गुर्रा कर काट लेने का वक़्त कब बीत गया।

    सोचती हूँ, धरती निश्चित एक औरत है कि प्रेम-गाथाओं से हुई पोषित बँटती रही टुकड़ों में और निगल भी पाई इलाक़ों में आग मूत रहे इन ऐतिहासिक प्रेमियों को।

    हक़ हमारे वायदों में रंजिशों की आह सहकर भी जूझता रहा।

    आह दर आह लेकिन टुकड़ों में बिखरता भी रहा मेरे तुम्हारे मायनों में मुझ पर तुम्हारा और तुम पर मेरा ये हक़।

    वीर्य का हर स्खलन इस क़दर कोख बनाता रहा तुम्हारी इच्छाओं का मुझे कि प्रेम के नाम पर पोषित करती रही तुम्हारे सभी अधिकारों को मेरी हर कोशिका।

    मेरा प्रेम, तुम्हारा अधिकार।

    मेरे लिए तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा अधिकार।

    मेरे लिए मेरा प्रेम, वो भी तुम्हारा ही अधिकार।

    यूँ ही किसी दिन दैत्यकायी जंतुओं का हुजूम पाताल के अंधियाले तल तक खींच ले जाएगा अधिकारों की रक्षा कर रहे युद्धपोतों को और मालिकों को हाथ मलने की फ़ुर्सत भी नहीं होगी।

    ईंटों से भी छोटी छिपकलियाँ उनके आसरों पर अपना अधिकार जता रहीं होंगी और इंद्रियों के उन्माद में मालिक मूतकर अपना शक्ति-प्रदर्शन कर रहा होगा।

    ऐसे किसी दिन तुम्हारे अधिकारों का प्रजनन मुझसे और हो पाएगा

    और तुम्हारी आँखों के सामने ही तलाश लूँगी मैं अपनी ज़मीन।

    स्रोत :
    • रचनाकार : उपांशु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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