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अपने अतीत के बारे में सोचना

apne atit ke bare mein sochna

आशीष गौड़

आशीष गौड़

अपने अतीत के बारे में सोचना

आशीष गौड़

और अधिकआशीष गौड़

    अपने अतीत के बारे में सोचना,

    पीछे मुड़कर देखना होगा।

    पर कितना पीछे मुड़ना होगा,

    अतीत के आख़िरी सिरे तक जाना।

    जो याद है, उसे याद करना,

    अतीत की गिरहें खोलना नहीं है।

    वह कल, जो याद नहीं,

    जो अब याद नहीं आता,

    वही अतीत की परिभाषा में वर्गीकृत होने योग्य है।

    पर फिर जो अब याद ही नहीं,

    याद उसे किया कैसे जाए?

    क्या याद है तुम्हें वह पहली बारिश,

    जिसमें फेंक बस्ता भागे थे तुम,

    बेसब्र, बेसबब, बेपरवाह?

    याद तुम्हें क्या है धुंध की,

    उस सर्द सुबह की?

    जब नीले कान दर्द करती थीं तेज़ हवाएँ।

    और फिर

    एक बात,

    जो तुम्हें याद दिलाती थी

    वही सब,

    जो तुम

    रोज़ भूल जाया करते थे।

    कैसे याद आएगा वह पल,

    जीत जब एक आदत थी,

    और वह

    सांत्वना देने वाले हाथ,

    जब हार हुई थी

    पहली बार?

    आज की सभ्यता में

    उसी सांत्वना का औचित्य

    बिखरा जीवन बचा सकेगा।

    मुझे यहीं नहीं रुक जाना,

    देखना है पीछे मुड़कर

    उस हाथ का चेहरा

    और उस चेहरे की आँखों का पानी।

    वही पानी

    जीवन की डोर में लगी सेंध को

    सुलझाने का माध्यम बनेगा।

    मैं देर तक कोशिश करता हूँ,

    और जोड़ता हूँ वह सब कड़ियाँ,

    जो मुझे ले जाएँ घर।

    पर यहीं आकर

    खो देता हूँ मैं सब कुछ,

    जब गिरह खोलते जाने में

    समस्त जीवन की गाँठें

    धागा ही तिड़का देती हैं।

    मुश्किल होता जाता है साँस लेना,

    जब स्वयं की खोज को सार्थक करने की

    समस्त विधाएँ

    दम तोड़ती हुई प्रतीत होती हैं।

    असमर्थता और निष्फलता से भरे हुए परिवेश में

    स्वयं के अस्तित्व को परिणामोन्मुखी करने वाली विधा

    अतीत की राह पर अग्रसर होना है।

    पर फिर से सवाल वही जाया करता है—

    कितना पीछे मुड़ना होगा,

    सब कुछ फिर से शुरू होता देखने को?

    और जो याद हो,

    क्या होगा फिर उस खंडित अतीत का?

    कैसे फिर सार्थक होगी

    प्रासंगिकता अस्तित्व की?

    पर जीवन की गति को

    स्मृति आहत नहीं कर पाती,

    सिर्फ़ जीने की कला बदल देती है।

    अस्तित्व की प्रासंगिकता

    पूर्ण स्मृति में नहीं,

    उस अधूरी खोज में है,

    जिसे पूरा कर पाने की

    सचेत स्वीकृति

    मुझे ‘और मनुष्य’ बनाती है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : आशीष गौड़
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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