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अफरा-तफरी

aphra taphri

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    चारो ओर मचल बा कइसन अफरा-तफरी

    महँगाई के मार सभे के काट रहल बा

    सब बेहाल बा, बाकिर गुम्मी साध रहल बा

    अपनापन मुँह ताक रहल बा बइठल कगरी।

    झाँक रहल बा लाचारी आँखिन में सगरी

    बोलत नइखे केहू जइसे कंठ रूंधल बा

    निस्सहाय बा लोग आँख में लोर भरल बा

    सभे उछालत बाटे एक दूजे के पगरी।

    अगडा-पिछड़ा के झगडा में लोग फँसल बा

    मुँहदुबरा के कतहूँ केहू पूछत नइखे

    मारा-मारी, लूट-पाट हर ओर मचल बा

    केहू ओकर दुःख-दरद के बूझत नइखे।

    हमनी के एका से देखीं लोग ठगल बा

    ओकरा आगे केहू के कुछ सूझत नइखे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 13)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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