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अनुभव

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ऋत्विक्

ऋत्विक्

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ऋत्विक्

और अधिकऋत्विक्

    यह कैसा अनुभव है?

    क्या मैं सचमुच ही हो चुका हूँ

    बूढ़ा?

    वह भी केवल

    जन्म के बीसवें साल में?

    कैसे-कैसे भूत,

    कैसे-कैसे पिशाच

    स्वप्न में ले आते हैं बरात मृत्यु की,

    करते उद्घोष ज़ोर-ज़ोर से

    मेरे बुढ़ापे का!

    (असंभव अन्याय है यह)

    जीवन!

    कैसे? (सबसे ज़रूरी क्यों?)

    तुम डूबते सूरज की भाँति

    छोड़ गए बुढ़ापे की रात में

    मुझे।

    तुम कहाँ हो?

    कुछ तो होगा इलाज तुम्हारे पास?

    कुछ दवा-दारू?

    कुछ भी?

    जो बचा सके मुझे

    बुढ़ापे के इन कीड़ों से,

    स्मृतियों के खँडहरों से

    और आकाँक्षाओं की लहरों से

    ये मुझे खोखला करते जा रहे हैं…

    मुझे घेरता जा रहा है बुढ़ापा,

    साथ ही

    जीवन की आकाँक्षा

    फिर भयावह नृत्य स्मृतियों का,

    वह भी,

    जन्म के केवल बीसवें साल में!

    सुनो!

    सुनो!

    सुनो!

    मेरी पुकार…

    समेट कर समस्त प्रकाश अपना,

    तुम किस अँधेरी खोह में

    छिपे हो? (लौट आओ)

    वर्तमान!

    जीवन मेरे!

    अभी तो हुए हैं केवल

    बीस ही वर्ष!

    फिर किस शाप के वश में आकर

    खो दिया तुम्हें!

    (छिपे हो किस अँधेरी खोह में)

    फिर-फिर

    यह कैसा अनुभव है?

    क्या मैं सचमुच ही हो चुका हूँ

    बूढ़ा?

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऋत्विक्
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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