आन्हर छथि भगवान
anhar chhathi bhagvan
आन्हर छथि भगवान, कहओ के?
आजुक युगमे भौतिकवादक, फूसि-फटक अभिमान, कहओ के?
पाथरमे ओ बास करै छथि,
आ हमरे उपहास करै छथि,
हमरेसँ पुजबै छथि आ हमरेपर 'शेखी-शान', कहओ के?
सुन्दरता लय पुरुष फटै छथि,
नारी वर्गक नाक कटै छथि,
तेँ तँ महिला सब उठि चलली, काटय पुरुषक कान, कहओ के?
ओ लड़ती आ भिड़ती जा कऽ,
सभा-मंचपर अड़ती जा कऽ,
पुरुष-समाजक बीच झाड़ती, बड़काटा व्याख्यान, कहओ के?
पुरुषक हेतु अनारी नारी,
पुरुषे नारी हेतु अनारी,
फूसि घोँघाउजिमे दुनू दल, होइ छथि व्यर्थ हरान, कहओ के?
प्रकृति-पुरुष दूनू समान अछि,
ने ई न्यून, न ओ महान अछि,
युग-चक्रक चक्करपर नाचल, निश्चित अनुसन्धान कहओ के?
पेटक अछि लागल लपेट जा,
मुँहपर अछि लागल चपेट ता,
ककर माय ओ बाप ककर, वा होइत छै सन्तान, कहओ के?
सभक उखाही सब करैत अछि,
अपनेटा लय जग मरैत अछि,
आनक लेखेँ आन बनल अछि, आलू सड़ल-पुरान, कहओ के?
अपना लग संसार ढीठ अछि,
आँखिक लेखेँ पाछु पीठ अछि,
सभक जनै छै सब तैओ, अनके लय सब बैमान, कहओ के?
एकर विवेचन के करैत अछि,
जे 'करैत’ 1 अछि से करैत अछि,
हमरो सन बुड़िवान बुझै अछि, अपनाकेँ विद्वान, कहओ के?
सब अलच्छ अवतार लेलक अछि,
रुच्छ-छुच्छ संसार देलक अछि,
अपन बेगर्त्ते युग अछि आन्हर, परतच्छक परमान, कहओ के?
- पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 309)
- संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
- रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2025
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