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आँगनमे बिहुँसैत कनैल

anganame bihunsait kanail

दीप नारायण

दीप नारायण

आँगनमे बिहुँसैत कनैल

दीप नारायण

और अधिकदीप नारायण

    आइ भोरे

    जखन सुरुज अकास पर

    धरैत छथि पहिल डेग...

    पातक सोपान पर

    नान्हि-नान्हि

    निर्मल, गोल ओसक बुन्नी धरि

    नहुँ-नहुँ उतरैत छैक

    सिनुरिया किरिन।

    आँगनक पुबरिआ कोनमे

    देबाल पर बाँहि अरकौने

    गाछक सभ डारि पर

    सोनाक घाँटी जकाँ

    लटकल बिहुँसैत देखलियैक

    पीअर-पीअर कनैल।

    कि एकाएक

    बाजि उठैत अछि

    हमरा मोनमे सहस्त्रहुँ घाँटी

    घोरि दैत अछि अंतरमनमे संगीत।

    बसातक स्नेहास्पर्श सिहकीसँ

    डोलति हर्षातिरेकमे कनैलक डारि

    घरमे...मनमे...अंतरिक्षमे

    सौंदर्य घोरैत अछि।

    आम गाछक फुनगी पर बैसल फुद्दीसँ

    बतियाइत अछि कनैल...।

    स्वभिमानसँ ठाढ़ अभयदान परसैत

    खहरि गेल अछि हृदयक अंतसमे

    बिहँसैत कनैल...।

    कनैल बिहुँसैत अछि जतए आँगनमे

    ओतए, जतए अकासमे उड़ैत अछि चिड़ै

    शुरु होइछ अंतरिक्ष ओतहिसँ...

    ओतहिसँ जीवन कविता सेहो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आब कतेक चुप रहू (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 25)
    • रचनाकार : दीप नारायण
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2021

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