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आँधी के बाद

andhi ke baad

शिवांगी गोयल

शिवांगी गोयल

आँधी के बाद

शिवांगी गोयल

और अधिकशिवांगी गोयल

    साथी!

    हम इतनी भयानक आँधी में साथ थे

    और सुबह तक बने रहे

    जब ये सारे पेड़ अपनी जड़ों समेत

    अपनी मिट्टी से बाहर निकल आए, गिर पड़े

    ये पत्तियाँ अपनी टहनियों से अलग

    ये टहनियाँ अपने चितकबरे तनों से अलग

    निकल आईं और गिर पड़ीं

    तब तुम और मैं रुके रहे

    हम भी तो उजड़ सकते थे ग़लतफ़हमी की आँधी में

    कैसी तो उजाड़ रात थी, कैसी डरावनी भोर

    हम बिना आख़िरी शब्द कहे अपनी मिट्टी से उखड़ सकते थे

    कौन रोकता हमें? कौन रोपता हमें?

    पर हमने सुबह का सूरज एक साथ देखा

    हम बने रहे

    मिट्टी का जड़ों से क्या रिश्ता है

    इतना की जड़ें छोड़ती हैं मिट्टी को

    तो पूरी तरह नहीं छोड़ पातीं

    दोनों एक-दूसरे के हिस्से में थोड़ी बची रह जाती हैं

    हमने एक-दूसरे को थोड़ा बचा लिया

    हम एक-दूसरे में थोड़ा बने रहे

    मैं तुम्हारा घर तो नहीं पर

    कभी उड़ान से थक जाओ तो

    मेरे पास जाना

    उस छोटी चिड़िया की तरह जो

    आँधी में पेड़ की टहनी पर बैठी रह जाती है

    भरोसा करती है

    क्या चिड़िया का पेड़ से कोई रिश्ता है

    क्या तुम्हारा मुझसे कोई रिश्ता है?

    तुम जाना साथी, हम बने रहेंगे

    अलविदा के बाद भी

    स्रोत :
    • रचनाकार : शिवांगी गोयल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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