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अंधेपन की साहित्य-वृत्ति

andhepan ki sahitya vritti

खुआन मानुएल रोका

खुआन मानुएल रोका

अंधेपन की साहित्य-वृत्ति

खुआन मानुएल रोका

और अधिकखुआन मानुएल रोका

     

    I

     

    जब सूरज की लालिमा पक्षियों के चोंच पर गिर रही थी,

    मैं और मेरी माँ

    झाँक रहे थे बाल्कनी से नेत्रहीनों के आँगन।

     

    II

     

    अंधे बच्चे गेंद की जगह दूध के एक छोटे कनस्तर से खेलते हुए

    आवाज़ के पीछे भाग रहे थे। जब ये आवाज़ आँगन के

    किसी कोने से टकराकर वापस आए, बच्चे फिर उसका पीछा

    करें, रौंदते हुए पैरों से कनस्तर को एक-दूसरे की छाया को।

     

    III

     

    मेरी माँ और मैं बाल्कनी में। और नीचे, अँधेरों के फ़रिश्ते

    पागलों की तरह दौड़ रहे थे उस आवाज़ की पीछे।

    हमारे घर के ठीक बग़ल में एक बाड़ा था। मेरी माँ कमरे से

    होकर सफ़ाई करती हुई जा रही थी रूपचित्रों में स्वर्गवासियों

    के आँखों की। मैं सुन रहा था कमरे से आती हुई छायाओं की सरसराहट।

     

    IV

     

    उन पेड़ों के बीच जो हवा में अपने गाड़े फूलों को तैरा रहे थे,

    हमारा घर शरण देता था हमें उस तूफ़ानी शाम में। और जब रात

    होती, उस स्वप्न की गोद में बसा मैं किसी नेत्रहीन की तरह

    भागता उस अनजान महिला की कलकल आहट के पीछे।

     

    V

     

    पूछता पता उस विदेशिनी का, बिन सोचे कि हम सभी परदेसी

    हैं सपनों में। धारियों की टोप पहने बरसाती बाग़ानों से मैं

    घूमता, सुनता हुआ अस्तबल के रौंदे हुए छतों की आवाज़, या फिर

    पड़ोस के घरों से आती हुई बाइबलों की आहट।

     

    VI

     

    मेरे शरीर पर रात गोदना बनाती चली।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 91)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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