अनंत है मेरी
चांग-एन1 में तुम्हारे साथ होने की तड़प।
सुदूर, जहाँ झींगुरों की झंकार के धागे से
कुएँ की सुनहरी जगत के गिर्द
बुने पतझड़ के गीत,
एक बाँस की नीली पपड़ाई चटाई पर
बैठा, ऐंठा हुआ मैं, बुझा हुआ।
मेरी इकलौती लालटेन की मद्धिम रौशनी,
तुम्हारी गहरी चाह उद्दीप्त करती है
पर्दा उठाकर, मैं घूरता हूँ
कठोरता से चंद्रमा को।
असहाय मैं आह पर आह भरता हूँ
उस स्त्री की सुमन-सुगंधि के लिए जो
मुझसे इस क़दर दूर है जैसे
आकाश की वह दूरस्थ बदली।
ऊपर, रात्रि चढ़ती है
अनंत श्याम में
नीचे, यह गहरे हरे रंग की
लहराती हुई सरिता उछलती है।
क्या स्वर्ग को इतना ऊँचा होना चाहिए,
और पृथ्वी को इतना विशाल?
उनके बीच मेरी अतृप्त आत्मा
एक पथ पर भटकती है,
जो मेरे स्वप्नों तक में
सभी पहाड़ी दर्रों में अवरुद्ध है।
यह अनंत विषाद
मेरा दिल तोड़ता है।
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : लि पो
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